
-उदन्त मार्तण्ड से मोबाइल पत्रकारिता तक: ‘सबसे पहले नहीं, सबसे सही’ का मंत्र ही बनेगा ढाल
- रिपोर्ट: अमित कुमार
अयोध्या: हिन्दी पत्रकारिता की कोख से जब ‘उदन्त मार्तण्ड’ जन्मा, तब कलम ने पहली बार गुलामी की जंजीरों पर वार किया था। दो सदियों की इस यात्रा में पत्रकारिता लोकतंत्र की रीढ़ बनी, समाज की आवाज बनी। मगर आज जब खबर सेकंडों में वायरल होती है, तब यही कलम ‘फेक न्यूज’ के बारूदखाने पर खड़ी है।
डिजिटल क्रांति: अवसर भी, चुनौती भी
कभी अखबार, रेडियो और टीवी ही खबरों के बादशाह थे। अब मोबाइल की स्क्रीन पर दुनिया सिमट गई है। सोशल मीडिया ने हर हाथ को माइक थमा दिया। अच्छी बात है। मगर इसी मंच से आधी-अधूरी खबरें, भ्रामक सूचनाएं और बिना सत्यापन के बम भी फूट रहे हैं। विश्वसनीयता पर सीधा हमला हो रहा है।
तेज रफ्तार के दौर में ‘ठहरकर सच’ बोलना होगा
आज पत्रकार की जिम्मेदारी सिर्फ खबर देना नहीं रही। अब उसे तथ्यों की भट्टी में तपाकर सच निकालना है। सोशल मीडिया की अंधी दौड़ में पत्रकारिता का पुराना मंत्र सबसे ज्यादा धारदार हो गया है— ‘सबसे पहले नहीं, सबसे सही’। TRP और क्लिक की होड़ में अगर सत्य मरा, तो लोकतंत्र लंगड़ा हो जाएगा।
तकनीक नई, आत्मा वही
मोबाइल पत्रकारिता, लाइव स्ट्रीमिंग, डिजिटल रिपोर्टिंग ने खबरों को पंख लगा दिए। मगर याद रहे, कैमरा चाहे 4K का हो, पत्रकारिता की आत्मा आज भी वही है— सत्य, निष्पक्षता और जनहित। तकनीक हथियार है, ट्रिगर पर उंगली तो पत्रकार की ही है।
संकल्प: समझौता नहीं, संघर्ष जारी रहेगा
हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर हर कलम को शपथ लेनी होगी कि चाहे जितने नए प्लेटफॉर्म आ जाएं, मूल्यों से सौदा नहीं होगा। हमारी कलम समाज की आवाज़ रहेगी, लोकतंत्र की ढाल रहेगी और सत्य की मशाल बनकर जलती रहेगी।
सभी कलम के सिपाहियों को हिन्दी पत्रकारिता दिवस की क्रांतिकारी शुभकामनाएं। कलम मत झुकने देना, क्योंकि जब-जब कलम झुकी है, सच हारा है।




