
- ज्ञानेश वर्मा / यूपी हेड
भारत के एक महान समाज सुधारक की देशवासियों ने मनाई 135 वीं भव्य जयंती
लखनऊ।
डॉ. भीमराव अंबेडकर, जिन्हें हम ‘बाबासाहेब’ के नाम से जानते हैं, भारत के एक महान समाज सुधारक, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और भारतीय संविधान के मुख्य वास्तुकार थे। हर साल 14 अप्रैल को उनकी जयंती (अंबेडकर जयंती) पूरे उत्साह के साथ मनाई जाती है।
यहाँ उनके जीवन के मुख्य पहलुओं का संक्षिप्त विवरण दिया गया है:
1. जन्म और प्रारंभिक जीवन
जन्म: 14 अप्रैल, 1891 को मध्य प्रदेश के मऊ (Mhow) में हुआ था।
परिवार: वे रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई की 14वीं संतान थे। उनका परिवार दलित वर्ग (महार जाति) से था, जिसके कारण उन्हें बचपन में भारी भेदभाव और छुआछूत का सामना करना पड़ा।
2. शिक्षा की अद्भुत यात्रा
बाबासाहेब की शिक्षा उनके दृढ़ संकल्प की मिसाल है:
उन्होंने मुंबई के एलफिंस्टन हाई स्कूल से शिक्षा प्राप्त की और बाद में कोलंबिया विश्वविद्यालय (न्यूयॉर्क) और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से डॉक्टर ऑफ साइंस (D.Sc) जैसी उच्च डिग्रियां हासिल कीं।
वे अपने समय के सबसे शिक्षित भारतीयों में से एक थे, जिनके पास अर्थशास्त्र और कानून में विशेषज्ञता थी।
3. समाज सुधार और दलित आंदोलन
उन्होंने समाज में व्याप्त छुआछूत और जातिवाद के खिलाफ एक लंबी लड़ाई लड़ी।
मूकनायक और बहिष्कृत भारत जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने दलितों की आवाज़ उठाई।
1927 में महाड़ सत्याग्रह के जरिए उन्होंने दलितों को सार्वजनिक तालाब से पानी पीने का अधिकार दिलाने के लिए आंदोलन किया।
4. भारतीय संविधान का निर्माण
आजादी के बाद, उन्हें संविधान की प्रारूप समिति (Drafting Committee) का अध्यक्ष चुना गया।
उन्होंने एक ऐसा संविधान तैयार किया जो जाति, धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव को समाप्त कर सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है। इसी कारण उन्हें ‘भारतीय संविधान का जनक’ कहा जाता है।
5. महिलाओं और श्रमिकों के लिए कार्य
उन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए ‘हिंदू कोड बिल’ पेश किया।
श्रमिकों के लिए काम के घंटे 12 से घटाकर 8 करने और मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) जैसे कानून बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
6. बौद्ध धर्म का स्वीकार और महापरिनिर्वाण
अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में, उन्होंने समानता और शांति के मार्ग पर चलने के लिए बौद्ध धर्म अपना लिया।
6 दिसंबर, 1956 को उनका निधन हो गया, जिसे ‘महापरिनिर्वाण दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। उन्हें मरणोपरांत 1990 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया।
शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो। > — डॉ. बी.आर. अंबेडकर।
राजधानी लखनऊ में भव्य व अलग अलग तरीके से राजधानी लखनऊ वाशियो ने मनाई अंबेडकर जी की जयंती
लखनऊ में 14 अप्रैल 2026 को बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की 135वीं जयंती बहुत ही धूमधाम और विविध आयोजनों के साथ मनाई गई। शहर में श्रद्धाजंलि सभाओं से लेकर सांस्कृतिक उत्सवों तक की धूम रही।
1. राजकीय और मुख्य समारोह*
अंबेडकर महासभा (हजरतगंज): यहाँ मुख्य राजकीय कार्यक्रम हुआ जहाँ मुख्यमंत्री और अन्य गणमान्य नागरिकों ने बाबा साहब के अस्थि कलश पर पुष्पांजलि अर्पित की। इस अवसर पर ‘डॉ. अंबेडकर रत्न’ सम्मान भी प्रदान किए गए।
* *अंबेडकर मेमोरियल पार्क (गोमती नगर):* यहाँ भव्य सजावट की गई और हज़ारों की संख्या में लोग बाबा साहब को नमन करने पहुँचे। यहाँ सांस्कृतिक विभाग द्वारा लोकगीतों और नाटकों के माध्यम से उनके जीवन संघर्ष को दर्शाया गया।
*2. शैक्षणिक और बौद्धिक आयोजन*
* *BBAU (अंबेडकर विश्वविद्यालय):* परिसर में *’भीम वॉक’* का आयोजन किया गया। इसके बाद एक राष्ट्रीय संगोष्ठी (Seminar) हुई जिसमें शिक्षाविदों ने ‘आधुनिक भारत के निर्माण में अंबेडकर का योगदान’ विषय पर चर्चा की।
* *संविधान पाठ:* कई स्कूलों और कॉलेजों में छात्रों को भारतीय संविधान की प्रस्तावना (Preamble) की शपथ दिलाई गई।
*3. सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रम*
* *लोक कला और गायन:* संस्कृति विभाग द्वारा *राम निवास पासवान* और *संजू बघेल* जैसे कलाकारों के माध्यम से आल्हा, लोकगीत और मिशनरी गीतों की प्रस्तुतियाँ दी गईं।
* *भीम यात्रा और रैलियाँ:* शहर के विभिन्न हिस्सों, जैसे सुल्तानपुर रोड और राजाजीपुरम में युवाओं द्वारा वाहन रैलियाँ और ‘भीम यात्रा’ निकाली गई, जिसमें “शिक्षित बनो, संगठित रहो” के नारे लगाए गए।
*4. सेवा कार्य और जन कल्याण*
* *भंडारा और शरबत वितरण:* गर्मी को देखते हुए चारबाग, हजरतगंज और आलमबाग जैसे प्रमुख चौराहों पर स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा शीतल जल, शरबत और फल वितरण के कैंप लगाए गए।
* *स्वास्थ्य शिविर:* कुछ बस्तियों में मुफ्त स्वास्थ्य जाँच शिविर (Free Health Camps) लगाए गए और बाबा साहब के नाम पर स्वच्छता अभियान भी चलाया गया।
*5. राजनीतिक और सामुदायिक सक्रियता*
* *माल्यर्पण:* परिवर्तन चौक और हजरतगंज स्थित अंबेडकर प्रतिमाओं पर विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने भारी संख्या में पहुँचकर माल्यार्पण किया और विचार गोष्ठियाँ आयोजित कीं।
कुल मिलाकर, लखनऊ में यह दिन केवल एक छुट्टी की तरह नहीं बल्कि एक उत्सव की तरह मनाया गया, जिसमें समाज के हर वर्ग की भागीदारी दिखी।





