
- रिपोर्ट: प्राची सिंह
धर्म डेस्क: सनातन धर्म में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। इस तिथि को शरद पूर्णिमा, कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होते हैं। इस अवसर पर भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, चंद्र देव और राधा-कृष्ण की पूजा का विधान है।
साल 2026 में शरद पूर्णिमा की तिथि, पूजा मुहूर्त और चांदनी रात में खीर रखने की परंपरा को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है।
शरद पूर्णिमा 2026 कब है?
हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर 2026 को सुबह 11:55 बजे शुरू होगी और 26 अक्टूबर 2026 को सुबह 9:11 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि और चंद्रोदय व्यापिनी पूर्णिमा के आधार पर शरद पूर्णिमा 25 अक्टूबर, रविवार को मनाई जाएगी।
मिथिलांचल में इस अवसर को विशेष रूप से ‘चुमाओन’ के रूप में भी मनाया जाता है।
शरद पूर्णिमा 2026 पूजा का शुभ मुहूर्त
शरद पूर्णिमा की रात निशिता काल का पूजा मुहूर्त रात 11:39 बजे से 26 अक्टूबर की तड़के 12:31 बजे तक रहेगा। इस अवधि की कुल अवधि करीब 52 मिनट है।
क्यों खास है शरद पूर्णिमा की रात?
शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। ब्रज की धार्मिक और पौराणिक परंपराओं के अनुसार, इसी दिव्य रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण ने राधा रानी और गोपियों के साथ महारास किया था।
वहीं, पूर्वी भारत के कई क्षेत्रों, खासकर बंगाल और ओडिशा में इस रात कोजागरी लक्ष्मी पूजा की परंपरा है। मान्यता है कि माता लक्ष्मी इस रात पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जागने वाले भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं।
चांदनी रात में खीर रखने की परंपरा
शरद पूर्णिमा की रात खीर बनाकर उसे खुले आसमान के नीचे चांदनी में रखने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस रात चंद्रमा की किरणों में विशेष औषधीय और अमृतमयी गुण होते हैं। इसी विश्वास के चलते दूध, चावल, चीनी और मेवों से तैयार खीर को रातभर चांदनी में रखा जाता है।
अगली सुबह इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं में इसे आरोग्य, मानसिक शांति और सुख-समृद्धि से जोड़ा गया है।
शरद पूर्णिमा की पूजा विधि
- सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत या सात्विक पूजा का संकल्प लें।
- शाम को पूजा स्थल पर भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और राधा-कृष्ण की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
- धूप, दीप, रोली, अक्षत, पुष्प और फल अर्पित करें।
- चंद्रोदय के बाद चंद्र देव को जल और दूध मिलाकर अर्घ्य दें।
- दूध और चावल से सात्विक खीर बनाकर भगवान को भोग लगाएं।
- खीर के पात्र को महीन कपड़े या जाली से ढककर रातभर चांदनी में रखें।
- राधा-कृष्ण का स्मरण करते हुए ‘राधे-राधे’ या ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें।
- अगले दिन सुबह स्नान के बाद खीर को प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में वितरित करें।
नोट: यह जानकारी हिंदू पंचांग, धार्मिक मान्यताओं और लोक परंपराओं पर आधारित है। पूजा के स्थानीय मुहूर्त में क्षेत्र के अनुसार अंतर हो सकता है।




