
-रोक लगाने की मांग अधिवक्ताओं ने कहा—राजनीतिक मतभेद अपनी जगह, लेकिन देश के प्रधानमंत्री के प्रति मर्यादित भाषा और संवैधानिक गरिमा का सम्मान जरूरी
- वाराणसी मंडल ब्यूरो पंकज झा
Varanasi: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित रूप से अमर्यादित भाषा के प्रयोग और दुष्प्रचार को लेकर अधिवक्ताओं में आक्रोश देखने को मिला। अधिवक्ताओं ने ऐसे बयानों और प्रचार पर रोक लगाने की मांग करते हुए कहा कि राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन किसी भी संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति के प्रति भाषा की मर्यादा बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है।
अधिवक्ताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री देश के एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पद का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में उनके खिलाफ व्यक्तिगत टिप्पणी, अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल अथवा भ्रामक और तथ्यहीन प्रचार से राजनीतिक वातावरण के साथ-साथ सामाजिक सौहार्द पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विचारों की असहमति का पूरा अधिकार है, लेकिन असहमति को अभद्रता और व्यक्तिगत आरोपों का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान यही है कि राजनीतिक दल और उनके समर्थक नीतियों एवं निर्णयों पर तार्किक सवाल उठाएं तथा तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखें।
सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार को लेकर भी चिंता
अधिवक्ताओं ने सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने वाली भ्रामक सूचनाओं और एडिटेड सामग्री को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि बिना सत्यापन किसी भी व्यक्ति के संबंध में आपत्तिजनक अथवा भ्रामक सामग्री साझा करने से समाज में गलत संदेश जाता है।
उन्होंने संबंधित जिम्मेदार संस्थाओं से मांग की कि अमर्यादित भाषा, झूठे दावों और जानबूझकर फैलाए जा रहे दुष्प्रचार की निगरानी कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए। साथ ही आम लोगों से भी अपील की गई कि वे किसी भी सामग्री को साझा करने से पहले उसकी सत्यता की पुष्टि अवश्य करें।
“असहमति हो, लेकिन भाषा की मर्यादा बनी रहे”
अधिवक्ताओं ने कहा कि राजनीतिक विचारधारा अथवा नीतियों को लेकर किसी भी व्यक्ति को अपनी असहमति व्यक्त करने का अधिकार है, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर अपमानजनक टिप्पणी उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक पदों की गरिमा बनाए रखना केवल सरकार या किसी राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है।
अधिवक्ताओं ने उम्मीद जताई कि राजनीतिक दल, जनप्रतिनिधि और सोशल मीडिया से जुड़े लोग लोकतांत्रिक संवाद की गरिमा बनाए रखते हुए तथ्यों एवं तर्कों के आधार पर अपनी बात रखेंगे, ताकि राजनीतिक मतभेद सामाजिक कटुता में परिवर्तित न हों।





