
- Pankaj jha…✍️✍️
वाराणसी। शहर की रफ्तार के बीच कुछ रास्ते ऐसे भी हैं, जहां पहुंचते ही विकास की चमक जैसे अचानक धुंधली पड़ जाती है। औरंगाबाद से सोनिया होते हुए सिगरा स्टेडियम की ओर जाने वाला मार्ग इन दिनों कुछ ऐसी ही तस्वीर पेश कर रहा है। सड़क के किनारे कूड़े का ढेर, उसके आगे पसरी कीचड़ और आसपास मंडराते छुट्टा पशु—मानो राहगीरों के लिए रास्ता नहीं, बल्कि हर रोज की एक नई परीक्षा हो।
कूड़ा घर के आसपास की स्थिति देखकर सबसे पहला सवाल यही उठता है—आखिर यह बदहाली कब तक?
जहां लोगों को साफ-सुथरे और सुरक्षित रास्ते की उम्मीद रहती है, वहां गंदगी और कीचड़ ने आवाजाही को असुविधाजनक बना दिया है। दोपहिया वाहन चालकों को फिसलन से बचते हुए निकलना पड़ता है तो पैदल राहगीरों के लिए रास्ता पार करना अपने आप में चुनौती बन जाता है।
और परेशानी यहीं खत्म नहीं होती। कूड़ा घर के आसपास जमा रहने वाले छुट्टा पशु इस पूरे दृश्य को और गंभीर बना देते हैं। सड़क पर अचानक पशुओं के आ जाने से यातायात प्रभावित होने की आशंका बनी रहती है। ऐसे में सवाल यह नहीं कि समस्या दिखाई दे रही है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या इस समस्या के स्थायी समाधान की ओर पर्याप्त ध्यान जा रहा है?
दावों से आगे, जमीन पर दिखे व्यवस्था
शहर को स्वच्छ, सुंदर और व्यवस्थित बनाने की बात लगातार होती है। लेकिन शहर की वास्तविक तस्वीर उन स्थानों पर भी दिखाई देती है, जहां आम नागरिक रोजाना गुजरता है। औरंगाबाद-सोनिया मार्ग की यह स्थिति इसी जमीनी हकीकत की ओर ध्यान खींचती है।
कूड़े की नियमित सफाई हो, सड़क पर जमा कीचड़ का समाधान हो या छुट्टा पशुओं को नियंत्रित करने की व्यवस्था—इन सभी मोर्चों पर स्थानीय नागरिकों की अपेक्षा एक ही है कि समस्या को अस्थायी तौर पर नहीं, बल्कि स्थायी रूप से दूर किया जाए।
निगाहें कब पड़ेंगी इस रास्ते पर?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब यह मार्ग प्रतिदिन लोगों की आवाजाही का हिस्सा है, तो इसकी बदहाली जिम्मेदार व्यवस्था की नजर में कब आएगी? क्या किसी अप्रिय घटना के बाद ही ऐसे स्थानों पर गंभीरता से ध्यान दिया जाएगा, या उससे पहले ही व्यवस्था जागेगी?
यह सवाल किसी व्यक्ति या संस्था पर आरोप लगाने के लिए नहीं, बल्कि जवाबदेही और बेहतर व्यवस्था की उम्मीद में उठ रहा है।
शहर की खूबसूरती केवल मुख्य सड़कों, चौराहों और चमकती इमारतों से नहीं होती। शहर तब खूबसूरत कहलाता है, जब उसके वे रास्ते भी साफ, सुरक्षित और सुगम हों, जिनसे होकर आम नागरिक अपनी मंजिल तक पहुंचता है।
औरंगाबाद से सोनिया और सिगरा स्टेडियम की ओर जाने वाला यह रास्ता आज व्यवस्था से सिर्फ इतना पूछ रहा है—
‘मुझे कब रास्ता समझा जाएगा, समस्या नहीं?’





