
- रिपोर्ट: अनुराग सिंह बिष्ट
लखनऊ: कहते हैं कि सरकारी तंत्र को नींद बहुत प्यारी होती है। जनता चीखती रहे, फाइलें धूल खाती रहें, लेकिन मज़ाल है कि कुंभकर्णी नींद में सोए हुक्मरानों की आंखें खुल जाएं। मगर साहब, हमेशा ऐसा नहीं होता। जब बात सूबे के मुखिया यानी माननीय मुख्यमंत्री जी के सम्मान और विभाग की साख से जुड़ जाए, तो यही सुस्त अफ़सर रॉकेट की रफ्तार से जागते हैं और वो फैसले लेते हैं जिनकी उम्मीद आम जनता सालों-साल नहीं कर सकती।
ताजा मामला नवाबों के शहर लखनऊ का है, जहां सिंचाई विभाग के कारनामों ने एक नया इतिहास रच दिया है।
कल का हड़कंप, जब वैध पर चिपका अवैध का पर्चा,
कहानी की शुरुआत होती है कल से, जब हैदर कैनाल बंधे पर अवैध अतिक्रमण हटाने का जिम्मा पाकर विभाग के जांबाज अधिकारी पूरे दलबल के साथ मैदान में उतरे। लेकिन हमारे सरकारी अमले की एक शाश्वत खूबी है। ये जब काम करते हैं, तो इतना डूबकर करते हैं कि वैध और अवैध का फर्क ही भूल जाते हैं। जूनियर इंजीनियर (JE) साहब जोश-जोश में उन शरीफ, कानूनी और वैध मकानों पर भी बेधड़क नोटिस चिपका आए, जिनका इस अतिक्रमण से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था।
बस फिर क्या था, कल जैसे ही ये नोटिस चस्पा हुए, पूरे इलाके में हड़कंप मच गया! जनता सड़कों पर आ गई, चीख-पुकार मच गई कि साहब, हमारे पास तो सारे जायज कागजात हैं, फिर ये तानाशाही क्यों? देखते ही देखते मामला सोशल मीडिया से लेकर शासन के गलियारों तक गूंज उठा। अफ़सरों को समझ आ गया कि इस बार तीर गलत निशाने पर लग गया है और मामला सीधे मुख्यमंत्री जी के जीरो-टॉलरेंस वाले सम्मान से जा टकराया है। कल मचे इसी हड़कंप का नतीजा था कि विभाग की रातों की नींद हराम हो गई।
साख पर बनी, तो 24 घंटे में जागा तंत्र आम दिनों में अगर किसी निर्दोष को गलत नोटिस थमा दिया जाए, तो फाइलें टेबल-दर-टेबल सालों तक रेंगती रहती हैं। जांच कमेटी गठित कर दी गई है का बोर्ड टांगकर अफ़सरान फिर से सो जाते हैं। लेकिन इस बार मामला बेहद संवेदनशील था। नतीजा? कल हड़कंप मचा और आज आदेश हाजिर!
सुपरिटेंडेंट इंजीनियर साहब ने बिना एक पल गंवाए, तुरंत भारी-भरकम शब्दों वाला कार्यालय ज्ञाप जारी कर दिया। गलती करने वाले जेई मंगल प्रसाद वर्मा को तत्काल प्रभाव से वहां से हटाकर षष्टम मंडल से संबद्ध लूप लाइन में कर दिया गया और 7 दिन के अंदर स्पष्टीकरण मांग लिया गया। सरकारी भाषा में इसे विभागीय छवि धूमिल होना कहा गया, लेकिन आम जनता की भाषा में कहें तो जहां का आदेश था वहां तो जो हुआ सो हुआ, लेकिन जहां नहीं होना था, वहां भी पर्चे बांट आए!
इस पूरे मामले ने सरकारी विभागों के उस खौफनाक और लापरवाह रवैये को एक बार फिर सरेआम उजागर कर दिया है, जिससे जनता रोज दो-चार होती है। आज यह हकीकत सबके सामने आ गई कि कैसे अफ़सरों की मर्जी और कागजों की हेरफेर से किसी को भी डरा दिया जाता है और कहीं भी नोटिस टांग दिया जाता है।
मजेदार बात यह भी है कि इस पूरे ड्रामे में एक और किरदार, जेई विवेक गुप्ता भी चर्चाओं और विवादों के केंद्र में रहे, लेकिन उन पर कार्रवाई की आंच तक नहीं पहुंची। शायद उनकी नींद या उनकी पहुंच विभाग को ज्यादा प्रिय लग गई।
बधाई हो सिंचाई विभाग को, जो कल मचे हड़कंप के बहाने ही सही, अपनी गहरी नींद से जागा तो सही! लेकिन जनता आज भी यही सोचकर कांप रही है कि अगली सुबह कहीं कोई अफ़सर नींद में चलते हुए उनके आशियाने पर भी अवैध का ठप्पा न लगा दे। क्योंकि साहब, यह लखनऊ का सिंचाई विभाग है, यहां कहां का आदेश कहां चस्पा हो जाए और किसकी किस्मत पर ताला लग जाए, इसका अंदाजा तो खुद विधाता भी नहीं लगा सकते!




