
- रिपोर्ट: स्निग्धा श्रीवास्तव
नई दिल्ली। रुपये पर बढ़ते दबाव और विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी के बीच केंद्र सरकार ने विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने अध्यादेश जारी कर आयकर अधिनियम में संशोधन किया है, जिसके तहत विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) को सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) में निवेश से होने वाले दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ (LTCG) पर अब कोई कर नहीं देना होगा।
सरकार का मानना है कि इस फैसले से भारतीय सरकारी बॉन्ड बाजार विदेशी निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक बनेगा और देश में दीर्घकालिक विदेशी निवेश को बढ़ावा मिलेगा। सरकारी प्रतिभूतियां लंबी अवधि के निवेश का प्रमुख माध्यम मानी जाती हैं, इसलिए यह कर छूट स्थिर और टिकाऊ पूंजी प्रवाह सुनिश्चित करने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।
इससे पहले विदेशी निवेशकों को इक्विटी और डेट निवेश से होने वाले दीर्घकालिक लाभ पर 12.5 प्रतिशत LTCG टैक्स देना पड़ता था। जुलाई 2024 के केंद्रीय बजट में इस कर दर को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 12.5 प्रतिशत किया गया था।
यह निर्णय ऐसे समय लिया गया है जब वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनाव के चलते विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजारों से बड़ी मात्रा में पूंजी निकाली है। इसका असर शेयर बाजार के साथ-साथ भारतीय रुपये पर भी पड़ा है।
महंगे कच्चे तेल, बढ़ते व्यापार घाटे और डॉलर की मजबूत मांग के कारण रुपये में लगातार कमजोरी देखी गई है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली के चलते रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंचा, जिसके बाद भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करना पड़ा।
रुपये को स्थिर बनाए रखने के लिए आरबीआई लगातार विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर रहा है। इसके अलावा केंद्रीय बैंक ने कुछ दीर्घकालिक सरकारी बॉन्ड को ‘फुली एक्सेसिबल रूट’ (Fully Accessible Route) के तहत शामिल कर विदेशी निवेशकों के लिए निवेश की प्रक्रिया को और आसान बनाया है।
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि LTCG टैक्स हटने से विदेशी निवेशकों का शुद्ध रिटर्न बढ़ेगा, जिससे भारतीय सरकारी बॉन्ड बाजार में उनकी भागीदारी बढ़ सकती है। इससे विदेशी मुद्रा का प्रवाह मजबूत होगा, बाजार में तरलता बढ़ेगी और सरकार को बुनियादी ढांचा एवं विकास परियोजनाओं के लिए धन जुटाने में सहायता मिलेगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार का यह फैसला भारतीय वित्तीय बाजारों को वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण नीतिगत सुधार है। इससे निवेशकों का विश्वास बढ़ने के साथ-साथ देश में दीर्घकालिक विदेशी पूंजी निवेश को भी नई गति मिलने की उम्मीद है।





