
- वाराणसी मंडल ब्यूरो पंकज झा✍️✍️
वाराणसी। धर्म, संस्कृति और प्राचीन स्थापत्य कला की विश्वव्यापी पहचान रखने वाली काशी में ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। काशीराज काली मंदिर के खूबसूरत नक्काशीदार मुख्य द्वार पर दुकानों के बोर्ड लगाए जाने से उसकी ऐतिहासिक सुंदरता प्रभावित होने की बात सामने आई है। आरोप है कि व्यावसायिक प्रचार के लिए लगाए गए बोर्डों के कारण मंदिर के मुख्य द्वार की बेजोड़ नक्काशी काफी हद तक ढक गई है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या काशी की अनमोल विरासत की खूबसूरती से ज्यादा अहमियत दुकानों के प्रचार को दी जा रही है?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, काशी की इस धरोहर पर भी एक नजर डालिए!
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सार्वजनिक रूप से धार्मिक स्थलों और मंदिरों के आसपास अतिक्रमण के विरुद्ध कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं। ऐसे में काशीराज काली मंदिर के नक्काशीदार मुख्य द्वार की वर्तमान स्थिति भी संबंधित अधिकारियों के संज्ञान में आनी चाहिए। यदि मंदिर के द्वार पर लगे दुकानों के बोर्ड उसकी ऐतिहासिक नक्काशी को ढक रहे हैं, तो यह जांच का विषय है कि वहां नियमों के अनुरूप व्यवस्था है या नहीं।
जब मंदिरों और धार्मिक स्थलों को अतिक्रमण से मुक्त रखने की बात होती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—काशीराज काली मंदिर के इस नक्काशीदार द्वार की खूबसूरती पर ध्यान कौन देगा? क्या नगर निगम, जिला प्रशासन और हेरिटेज संरक्षण से जुड़े अधिकारी इस मामले की जांच करेंगे? क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक इस धरोहर की स्थिति की जानकारी पहुंचेगी? यह किसी पर व्यक्तिगत आरोप लगाने का नहीं, बल्कि प्रशासन का ध्यान एक महत्वपूर्ण जनहित के मुद्दे की ओर आकर्षित करने का प्रयास है।
पहले दिखती थी नक्काशी की खूबसूरती, अब बोर्डों के कारण पहचान प्रभावित होने की शिकायत
मंदिर के मुख्य द्वार की पुरानी और वर्तमान तस्वीरें इस विषय को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। पहले जहां द्वार की कलात्मक नक्काशी स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी, वहीं अब बोर्डों के कारण उसकी खूबसूरती प्रभावित होने की बात कही जा रही है। यह केवल एक द्वार का मामला नहीं, बल्कि काशी की ऐतिहासिक पहचान और स्थापत्य विरासत को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी से जुड़ा सवाल है।
जिस नक्काशीदार द्वार को बनाने में कारीगरों की मेहनत, हुनर और कला का योगदान रहा होगा, उसकी सुंदरता यदि व्यावसायिक बोर्डों के पीछे छिप जाए, तो यह निश्चित रूप से चिंता का विषय है। दुकानों के बोर्ड समय के साथ बदले जा सकते हैं, लेकिन ऐतिहासिक नक्काशी की सांस्कृतिक अहमियत और विरासत का मूल्य पीढ़ियों तक बना रहता है।
नगर निगम से लेकर जिला प्रशासन तक सवाल—आखिर निगरानी की जिम्मेदारी किसकी?
इस पूरे मामले में नगर निगम और संबंधित विभागों की भूमिका को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि मंदिर का मुख्य द्वार दुकानों के बोर्डों से ढक रहा है, तो क्या संबंधित अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण किया है? क्या यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि ऐतिहासिक स्थापत्य की सुंदरता व्यावसायिक प्रचार के कारण प्रभावित न हो?
नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों के साथ-साथ जिला प्रशासन और हेरिटेज संरक्षण से जुड़े उच्च अधिकारियों को भी इस मामले का संज्ञान लेकर वस्तुस्थिति की जांच करनी चाहिए। संबंधित क्षेत्र में यदि विरासत संरक्षण या साइनबोर्ड लगाने से जुड़े विशेष नियम लागू हैं, तो उनकी जानकारी स्पष्ट की जानी चाहिए। जांच में नियमों का उल्लंघन सामने आने पर नियमानुसार कार्रवाई भी सुनिश्चित होनी चाहिए।
सवाल यह भी है कि जब ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित रखने की जिम्मेदारी प्रशासनिक व्यवस्था पर है, तो फिर ऐसी धरोहरों की सुंदरता बचाने के लिए प्रभावी निगरानी क्यों नजर नहीं आती? क्या जिम्मेदार अधिकारी मौके पर पहुंचकर स्थिति का आकलन करेंगे, या मंदिर के नक्काशीदार द्वार की खूबसूरती बोर्डों के पीछे छिपी रहेगी?
कारोबार अपनी जगह, काशी की विरासत अपनी जगह
काशी की पहचान केवल मंदिरों, धार्मिक आयोजनों और आस्था तक सीमित नहीं है। यहां की प्राचीन गलियां, ऐतिहासिक भवन, मंदिरों के कलात्मक द्वार और पारंपरिक स्थापत्य भी इस शहर की विशिष्ट पहचान हैं। इन धरोहरों का संरक्षण प्रशासन, स्थानीय नागरिकों और व्यापारियों की साझा जिम्मेदारी है।
यह किसी के व्यवसाय का विरोध नहीं, बल्कि काशी की ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखने की जनहित में उठाई गई आवाज है। दुकानों की पहचान के लिए बोर्ड लगाए जा सकते हैं, लेकिन उनकी व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि मंदिर की प्राचीन नक्काशी और स्थापत्य कला की सुंदरता स्पष्ट रूप से दिखाई देती रहे।
यदि बोर्डों के कारण मुख्य द्वार ढक रहा है, तो संबंधित अधिकारियों को मौके का निरीक्षण कर ऐसा समाधान निकालना चाहिए, जिससे व्यापारियों के हित भी सुरक्षित रहें और मंदिर की ऐतिहासिक सुंदरता भी बरकरार रहे।
जनहित में मांग—मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, नगर निगम और उच्च अधिकारी करें हस्तक्षेप
काशीराज काली मंदिर के मुख्य द्वार की वर्तमान स्थिति की जांच कराई जाए। यह स्पष्ट किया जाए कि संबंधित क्षेत्र में कौन-से विरासत संरक्षण नियम लागू हैं और दुकानों के बोर्ड लगाने के संबंध में क्या प्रावधान हैं।
यदि जांच में नियमों का उल्लंघन या अनुचित अतिक्रमण सामने आता है, तो नियमानुसार कार्रवाई करते हुए मंदिर के नक्काशीदार द्वार की सुंदरता बहाल करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं। नगर निगम और जिला प्रशासन के अधिकारी यह भी सुनिश्चित करें कि भविष्य में ऐसी ऐतिहासिक धरोहरों की कलात्मक पहचान व्यावसायिक प्रचार के कारण प्रभावित न हो।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से भी आग्रह है कि इस मामले को संबंधित अधिकारियों के संज्ञान में लाने और नियमानुसार जांच सुनिश्चित कराने की दिशा में ध्यान दिया जाए, ताकि काशी की इस ऐतिहासिक धरोहर की सुंदरता सुरक्षित रखी जा सके।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—जब धार्मिक स्थलों को अतिक्रमण से मुक्त रखने की बात होती है, तो काशीराज काली मंदिर के इस नक्काशीदार द्वार की स्थिति की जांच कब होगी? नगर निगम कब जागेगा? जिला प्रशासन कब संज्ञान लेगा? और जिम्मेदार उच्च अधिकारी कब इस धरोहर की सुध लेंगे?
काशी की विरासत किसी एक व्यक्ति, दुकान या विभाग की नहीं, बल्कि पूरे समाज की अमूल्य धरोहर है। दुकानों के बोर्ड बदले जा सकते हैं, लेकिन इतिहास और स्थापत्य की पहचान को सुरक्षित रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
योगी जी, काशी की इस धरोहर पर भी एक नजर डालिए! सवाल किसी की कमाई रोकने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि कारोबार के बीच काशी की ऐतिहासिक सुंदरता और सांस्कृतिक पहचान कहीं खो न जाए।
विरासत बचेगी, तभी काशी की पहचान बचेगी। अब जरूरत है कि जिम्मेदार अधिकारी इस जनहित के सवाल को गंभीरता से लें और नियमानुसार उचित कदम उठाएं।





