
-रसूख और दबाव का कानून व्यवस्था पर पड़ता असर,
- रिपोर्ट: ज्ञानेश वर्मा / यूपी हेड
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कानून-व्यवस्था की स्थिति एक ऐसा विषय है जिस पर अक्सर चर्चा होती है। पुलिस मुख्यालय से लेकर थाने की चौखट तक का जो ढांचा है, उसमें कई ऐसी संरचनात्मक और व्यावहारिक कमियाँ हैं जो जाने-अनजाने में अपराधियों के हौसले बढ़ाती हैं। जब तक पुलिस और जनता के बीच के इस तालमेल में सुधार नहीं होता, तब तक अपराध की जड़ें पूरी तरह से नहीं उखड़ सकतीं।
पुलिसिंग में सबसे बड़ी कमी एफआईआर दर्ज करने की हिचकिचाहट है। अक्सर थानों में छोटी शिकायतों को दर्ज करने के बजाय उन्हें आपसी समझौते या टालमटोल के जरिए निपटाने की कोशिश की जाती है। यह प्रवृत्ति सीधे तौर पर अपराधियों को यह संदेश देती है कि छोटी घटनाओं पर कोई सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं होगी। यह लापरवाही का चक्र तब और गहरा हो जाता है जब पुलिस का सूचना तंत्र, इन्फोर्मर नेटवर्क कमजोर पड़ जाता है। आधुनिक तकनीक और सर्विलांस के शोर में पुराने समय का वह बीट सिपाही अब गायब हो गया है, जो मोहल्ले की हर गतिविधि पर नजर रखता था। सूचना तंत्र के अभाव में पुलिस अक्सर घटना होने के बाद सक्रिय होती है, जबकि उसे घटना रोकने के लिए पहले से मुस्तैद होना चाहिए।
एक और बड़ी समस्या पुलिस के काम करने के तरीके में रसूख का असर है। जब कानून का डंडा हर नागरिक पर एक समान नहीं चलता और रसूखदार लोगों के दबाव में कार्रवाई की जाती है, तो कानून पर से आम आदमी का भरोसा डगमगाने लगता है। इसके अलावा, थानों में संसाधन और मैनपावर का असंतुलन भी एक बड़ी बाधा है। लखनऊ जैसे फैलते हुए शहर में जहाँ आबादी तेजी से बढ़ रही है, वहां पेट्रोलिंग केवल मुख्य सड़कों या वीआईपी मार्गों तक सिमट कर रह जाती है। गलियों और भीतरी इलाकों में अपराधी इसका फायदा उठाते हैं। साथ ही, मामलों की जांच में देरी और चार्जशीट समय पर दाखिल न होने से अपराधियों को कोर्ट से आसानी से जमानत मिल जाती है, जो पूरे सिस्टम की विफलता को दर्शाता है।
इन समस्याओं को दूर करने के लिए पुलिसिंग को पूरी तरह से सर्विस-ओरिएंटेड और संवेदनशील बनाने की आवश्यकता है। थाना स्तर पर पुलिस को अपनी कार्यशैली में पारदर्शिता लानी होगी। किसी भी पीड़ित को थाने से खाली हाथ वापस न लौटाना ही पुलिसिंग का पहला सफल कदम होगा। पुलिस को समुदाय के साथ जुड़कर कम्युनिटी पुलिसिंग को बढ़ावा देना चाहिए, जहाँ मोहल्ला समितियों के जरिए जनता खुद पुलिस की सहयोगी बने। अपराधी में डर पैदा करने के लिए प्रोएक्टिव पेट्रोलिंग बहुत जरूरी है, जिसमें केवल गाड़ियाँ ही नहीं, बल्कि जवानों का पैदल गश्त करना भी शामिल हो।
इसके अलावा हर थाने में साइबर और आर्थिक अपराधों के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित विंग का होना समय की मांग है, ताकि नई तकनीक से हो रहे अपराधों को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सके। पुलिस बल को बेहतर प्रशिक्षण देकर यह सिखाना होगा कि वर्दी का रौब जनता पर नहीं, बल्कि अपराध करने वालों पर होना चाहिए। जब पुलिस मुख्यालय की रणनीतियाँ थाने के सिपाही के व्यवहार में झलकने लगेंगी, तभी लखनऊ वास्तव में एक सुरक्षित शहर बन पाएगा। अपराध पर नियंत्रण केवल बल प्रयोग से नहीं, बल्कि कानून की समान पहुंच और जनता के भरोसे से ही संभव है।





