-पौधों को नैसर्गिक खाद देने के लिए डोमरी में मिट्टी की उर्वरता व सिंचाई का पुख्ता इंतजाम
-बंजर मिट्टी में ‘अमृत’ घोल रही मियावाकी तकनीक, तालाब और ड्रिप का दोहरा सुरक्षा कवच
- रिपोर्ट: पंकज झा
वाराणसी। डोमरी (सूजाबाद) में विकसित हो रहे शहरी वन में अब केवल पौधों की संख्या ही नहीं, बल्कि उनकी वैज्ञानिक देखभाल और मिट्टी के अनूठे उपचार ने विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है। यहां लगाए गए 2.51 लाख पौधों को जीवित रखने और उन्हें जंगल की शक्ल देने के लिए जमीन की उर्वरता पर विशेष काम किया जा रहा है। आमतौर पर खराब मानी जाने वाली मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए यहां ‘मिट्टी रिपेयरिंग’ का बड़ा अभियान चलाया गया है, जिसमें चार फीट गहरी खुदाई कर 100 टन कोकोपीट और 250 टन गाय के गोबर की खाद का वैज्ञानिक मिश्रण तैयार किया गया है।पौधों को नैसर्गिक खाद देने के लिए हर महीने 35,000 लीटर ‘जीवामृत’ का छिड़काव किया जा रहा है। मियावाकी विशेषज्ञ विशाल श्रीवास्तव के अनुसार, यह प्रक्रिया पहले छह महीने तक निरंतर चलेगी और अगले दो वर्षों तक अंतराल पर जारी रहेगी। जीवामृत मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाता है, जिससे पौधों की जड़ें तेजी से गहराई पकड़ती हैं। वर्तमान समय में वसंत के कारण पौधों से पत्ते झड़ना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जिसे अक्सर लोग पौधों का सूखना समझ लेते हैं, जबकि अंदरूनी तौर पर जड़ें मजबूत हो रही हैं। मार्च की गर्मी में पौधों की वृद्धि दर तेज करने के लिए यह पोषण और नमी का तालमेल सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है ।
सिंचाई के मोर्चे पर इस प्रोजेक्ट को पूरी तरह ‘वॉटर प्रूफ’ बनाया गया है। गर्मियों में पानी की किल्लत से निपटने के लिए परिसर में ही चार विशेष तालाब खोदे जाएंगे, जो भूजल स्तर को बनाए रखने के साथ-साथ आपातकालीन सिंचाई में मदद करेंगे। जल आपूर्ति के लिए दस बोरवेल स्थापित किए गए हैं और पानी की एक-एक बूंद का हिसाब रखने के लिए ड्रिप (टपक सिंचाई) और स्प्रिंकलर सिस्टम दोनों को एक साथ अपनाया गया है। इससे न केवल पानी की बचत हो रही है, बल्कि पौधों की पत्तियों पर जमा होने वाली धूल भी साफ होती रहती है, जिससे उनकी प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया बाधित नहीं होती।सुरक्षा के लिहाज से यहां पांच गार्ड्स की तैनाती की गई है और साथ ही पर्यावरण प्रेमियों के लिए एक विशेष योग स्थल भी बनाने की योजना है।
राज नर्सरी के माध्यम से मध्य प्रदेश के कई शहरों में दस लाख से अधिक पौधे लगा चुकी यह विशेषज्ञ टीम अब वाराणसी के इस हिस्से को ‘ऑक्सीजन हब’ बनाने में जुटी है। स्थानीय जलवायु के अनुकूल जामुन, आंवला, नीम और अर्जुन जैसी 35 प्रजातियों का यह सघन वन आने वाले समय में काशी के पर्यावरण के लिए मील का पत्थर साबित होगा। मियावाकी एक प्रमाणित और सफल पद्धति है। पर्याप्त शोध पत्र इसके परिणामों की पुष्टि करते हैं। हम यहाँ केवल पेड़ नहीं लगा रहे, बल्कि एक ऐसा ईकोसिस्टम बना रहे हैं जो आने वाली पीढ़ियों के लिए शुद्ध हवा का स्रोत बनेगा।”




