
- रिपोर्ट: अनुराग सिंह बिष्ट
लखनऊ
- पुलिस ने भांजी लाठी, वकीलों ने ताना सामूहिक अवकाश का तीर!
- सड़क पर खाया पुलिस का प्रसाद, अब अदालत में वकालतनामे से होगा हिसाब!
वाह रे हमारी व्यवस्था! जहां समाज में आम जनता पुलिस से डरती है और पुलिस वकीलों के काले कोट से कड़ा रुख रखती है, वहां लखनऊ में कुछ अलग ही कव्वाली चल रही है। 17 मई 2026 को लखनऊ के पुलिस प्रशासन ने वकीलों पर ऐसा लाठीचार्ज कर दिया कि सेंट्रल बार एसोसिएशन को संडे के दिन ही आपातकालीन बैठक बुलानी पड़ गई।
अब सोचिए, जो वकील अदालत में जजों के सामने बड़ी-बड़ी दलीलें देकर बड़े से बड़े अपराधियों को ज़मानत दिला देते हैं, वो खुद पुलिस की लाठियों के आगे पीड़ित बनकर बैठ गए हैं। इस पूरे घटनाक्रम के बाद एसोसिएशन ने जो पत्र जारी किए हैं, वो किसी ऐतिहासिक फरमान से कम नहीं हैं। आइए, इस फरमान के मुख्य बिंदुओं पर थोड़ा ज्ञान वर्धन करते हैं।
पुलिस की लाठी का जवाब वकील साहब अपनी कलम रोककर देंगे। प्रस्ताव संख्या-01 के अनुसार, लखनऊ जनपद न्यायालय के सभी वकील साहबान 18 मई से 20 मई 2026 तक पूर्णतः सामूहिक अवकाश पर रहेंगे। यानी तीन दिन तक अदालतें सूनी रहेंगी। तारीखें आगे बढ़ेंगी, मुवक्किल परेशान होंगे, लेकिन साहब! गुस्सा भी तो दिखाना जरूरी है। लाठी पुलिस ने मारी है, तो सजा अदालत और जनता भुगतेगी! 20 मई को दोपहर 2:00 बजे फिर से पंचायत (आम सभा) बैठेगी, तब तक के लिए नो वर्क, ओनली प्रोटेस्ट।
प्रस्ताव संख्या-02 कहता है कि एसोसिएशन के अध्यक्ष अखिलेश जायसवाल और महामंत्री अवनीश दीक्षित अब माननीय उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) लखनऊ खंडपीठ में चल रही याचिका में खुद पक्षकार बनेंगे। मतलब, तुमने हमें सड़क पर पीटा, हम तुम्हें अदालत के कटघरे में घसीटेंगे। वकालतनामा दाखिल होने जा रहा है, अब पुलिस वालों को कानून की किताबों के पन्ने गिनने पड़ेंगे।
प्रस्ताव संख्या-03 सीधा और तीखा है। मांग की गई है कि ठाकुरगंज थाने के प्रभारी ओमवीर सिंह, एक अज्ञात दरोगा और उनके साथ मौजूद 20 से 25 अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। वैसे, पुलिस अक्सर आम जनता के खिलाफ अज्ञात लोगों पर केस दर्ज करती है, लेकिन यहाँ वकीलों ने पुलिस वालों को ही अज्ञात बताकर उन्हीं का दांव उनपर खेल दिया है। अब देखना यह है कि पुलिस अपने ही ‘अज्ञात’ भाइयों को ढूंढ पाती है या नहीं।
आखिरी और सबसे भावुक प्रस्ताव संख्या-04 जो वकील साथी पुलिसिया प्रसाद (लाठीचार्ज) खाकर अस्पतालों में भर्ती हैं या घायल हुए हैं, उन्हें सेंट्रल बार एसोसिएशन लखनऊ की तरफ से इलाज के लिए आर्थिक सहायता दी जाएगी। यानी, चोट पुलिस की, दर्द वकीलों को, और इलाज का बिल बार एसोसिएशन का।
इस पूरे मामले की प्रतिलिपि (कॉपी) जिले के बड़े-बड़े हाकिमों, जैसे-जिला जज, मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (CJM) मंडलायुक्त और जिलाधिकारी को भेज दी गई है। अब देखना यह है कि लाठी की ताकत बड़ी होती है या काले कोट की दलीलें। फिलहाल तो लखनऊ की अदालतों में तीन दिन तक सिर्फ एक ही आवाज गूंजेगी, तारीख पर तारीख, लेकिन वकील साहब स्ट्राइक पर हैं!





