
-माफिया बनने की चाह में उजड़ती रहीं जिंदगियां, अपनों की गद्दारी से लेकर पुलिस मुठभेड़ तक पहुंचा कई कुख्यात बदमाशों का सफर
- वाराणसी मंडल ब्यूरो पंकज झा कलम से✍️
वाराणसी। अपराध की दुनिया दूर से जितनी चमकदार और ताकतवर दिखाई देती है, उसका अंत उतना ही भयावह हो सकता है। यहां वर्चस्व की चाहत दोस्ती को दुश्मनी में बदल देती है, भरोसे की जगह बंदूकें ले लेती हैं और ताकत के दम पर साम्राज्य खड़ा करने का सपना देखने वाले कई चेहरे अंततः इतिहास के पन्नों में सिमट जाते हैं। बनारस के आपराधिक इतिहास में ऐसे अनेक नाम दर्ज हैं, जिन्होंने कभी खौफ और दबदबे के सहारे अपनी पहचान बनाई, लेकिन समय के साथ उनकी कहानी का अंत हत्या, गैंगवार या पुलिस मुठभेड़ में हुआ।
इन घटनाओं का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि अपराध की राह चुनने वालों के साथ उनके परिवार भी इसकी कीमत चुकाते हैं। जिन माता-पिता को अपने बच्चों से बुढ़ापे में सहारे की उम्मीद होती है, कई बार उन्हीं के कंधों पर जवान बेटे की अर्थी उठाने की नौबत आ जाती है।
गैंग की ताकत बढ़ाने में गुजरी जिंदगी, अंत अपने ही लोगों के हाथों….
बनारस के पुराने आपराधिक घटनाक्रम में जैतपुरा के ईश्वरगंगी निवासी सुरेश गुप्ता का नाम भी शामिल रहा। कभी वह डिप्टी मेयर अनिल सिंह के करीबी माने जाते थे। उस दौर में प्रेम प्रकाश उर्फ मुन्ना बजरंगी का भी इलाके में प्रभाव था। बाद में गैंग के भीतर बदले समीकरणों और आपसी दुश्मनी ने कई लोगों की जिंदगी छीन ली।
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2003 में सुरेश गुप्ता की हत्या बजरंगी गैंग से जुड़े शूटरों ने कर दी थी। इसी वर्ष गैंग के भीतर विवाद के चलते रिंकू गुप्ता ने महेश यादव की गोली मारकर हत्या कर दी। सभासद मंटू यादव भी आपसी रंजिश का शिकार बने। 20 दिसंबर 2003 को फातमान रोड पर उनकी हत्या कर दी गई।
इन घटनाओं ने साफ कर दिया कि आपराधिक गिरोहों में वर्चस्व की लड़ाई का कोई स्थायी साथी नहीं होता। यहां रिश्ते और नजदीकियां भी कई बार जानलेवा दुश्मनी में बदल जाती हैं।
सभासदों की हत्याओं से दहला था शहर, गिरोह के भीतर ही खुलने लगीं बंदूकें
वर्ष 2004 में जिला कारागार के गेट पर सभासद बंशी यादव की हत्या कर दी गई। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, नौ मार्च को हुई इस वारदात में अन्नू त्रिपाठी और बाबू यादव के नाम सामने आए थे।
इसके बाद 21 दिसंबर 2005 को सभासद मंगल प्रजापति की हत्या हुई। कुछ समय बाद उनके करीबी रहे राकेश उर्फ लंबू को भी निशाना बनाया गया। 25 मई 2007 को घर से बुलाकर उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। राकेश पर मंगल प्रजापति की हत्या में शामिल होने का आरोप भी था।
वर्ष 2005 में जेल के भीतर अन्नू त्रिपाठी की हत्या कर दी गई। इस घटना में संतोष गुप्ता उर्फ किट्टू का नाम सामने आया। बाद में चार जून 2010 को तत्कालीन एसओजी प्रभारी गिरजाशंकर त्रिपाठी की टीम ने तेलियाबाग-चौकाघाट मार्ग पर मुठभेड़ के दौरान डेढ़ लाख रुपये के इनामी संतोष गुप्ता उर्फ किट्टू और उसके साथी संतोष सिंह को मार गिराया था।
इन घटनाओं ने अपराध जगत के भीतर चलने वाली वर्चस्व की लड़ाई और उसके परिणामों की भयावह तस्वीर सामने रखी।
दालमंडी से रामनगर तक, दुश्मनी की आग में बुझते रहे कई चेहरे
पुराने बनारस के दालमंडी इलाके में भी आपराधिक रंजिश की कई घटनाएं चर्चा में रहीं। सभासद कमाल की दिनदहाड़े हत्या से लेकर छोटे मिर्जा की हत्या तक, कई वारदातों ने इलाके को झकझोर दिया था।
कुख्यात बदमाश काले अन्नू की हत्या कर शव रामनगर थाना क्षेत्र में फेंके जाने की घटना भी इसी सिलसिले की एक कड़ी रही। वहीं, दालमंडी के राजू बम की हत्या के बाद उसका शव अलईपुरा के पास रेलवे ट्रैक पर फेंक दिया गया था।
वर्ष 2012 में तत्कालीन राज्यमंत्री शकील बबलू के छोटे भाई शेखू की भी दालमंडी में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इन वारदातों ने दिखाया कि आपराधिक वर्चस्व की लड़ाई में इलाके, पहचान और पुराने संबंध किसी की सुरक्षा की गारंटी नहीं बन सके।
इसी तरह ठेकेदार सुनील सिंह, गुड्डू सिंह, पप्पू सिंह और बिहार के कोल कारोबारी राजीव सिंह से जुड़ी हत्याओं ने भी अपराध जगत के आपसी संघर्षों को सुर्खियों में रखा।
शूटर बनने की कीमत: गैंगवार में मौत और परिवारों का अकेलापन
30 जुलाई 2008 को सिगरा के शास्त्री नगर क्षेत्र में रमेश उर्फ बाबू यादव की मौत ने भी अपराध जगत के खतरनाक चेहरे को सामने रखा। मुख्तार और मुन्ना बजरंगी के गिरोहों से जुड़े शूटर के रूप में चर्चित बाबू यादव सिद्धगिरी बाग में हुई गैंगवार के दौरान गोली लगने से घायल हुआ था। घटनाक्रम के दौरान वह धर्मेंद्र सिंह पप्पू के गनर की गोली का शिकार बना।
इसी घटना से जुड़े घटनाक्रम में उसके दो साथी सिगरा स्थित बिग बाजार के पास तत्कालीन थाना प्रभारी संजयनाथ तिवारी की टीम के साथ मुठभेड़ में मारे गए थे।
कभी बड़े अपराधियों के साथ उठने-बैठने और गिरोहों में पहचान बनाने वाले इन लोगों की जिंदगी का अंत ऐसा हुआ कि उनके पुराने प्रभाव और संपर्क भी किसी काम नहीं आए। अपराध जगत में नाम कमाने की चाहत रखने वालों के लिए ऐसी घटनाएं गंभीर चेतावनी हैं।
पुरानी रंजिश ने लिया खूनी रूप, वर्षों बाद भी नहीं थमा हिसाब-किताब
वर्ष 2013 में विवेक कट्टा को रामनगर के डोमरी क्षेत्र में गोली मारी गई थी। इस घटना के बाद चली दुश्मनी का खूनी परिणाम 28 अगस्त 2020 को सामने आया, जब चौकाघाट इलाके में अभिषेक उर्फ प्रिंस और एक अन्य राहगीर की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई।
इस वारदात में विवेक कट्टा के साथ दो लाख रुपये के इनामी बदमाश मनीष सिंह उर्फ सोनू का नाम भी सामने आया था। इस घटना ने एक बार फिर साबित किया कि पुरानी रंजिशें वर्षों तक जिंदा रह सकती हैं और उनका खामियाजा उन लोगों को भी भुगतना पड़ सकता है, जिनका विवाद से सीधा संबंध नहीं होता।
एसओजी और एसटीएफ की कार्रवाई में खत्म हुए कई कुख्यातों के अध्याय
वर्ष 2007 से 2010 के बीच बनारस के अपराध जगत में कई बदमाशों के नाम चर्चा में रहे। राजू तिवारी, रिंकू तिवारी, दुर्गा अग्रहरि, श्याम कश्यप, दीपक सिंह बहेड़ा, उमेश पहलवान, महाजन पटेल, संतोष गुप्ता उर्फ किट्टू और संतोष सिंह जैसे नाम उस दौर की आपराधिक घटनाओं से जुड़े रहे।
तत्कालीन एसओजी प्रभारी गिरजाशंकर त्रिपाठी की टीम की कार्रवाई के दौरान कई बदमाशों का अंत हुआ। इसके बाद भी शहर और आसपास के इलाकों में आपराधिक गिरोहों के बीच संघर्ष तथा पुलिस कार्रवाई का सिलसिला जारी रहा।
अगस्त 2014 में मिर्जापुर जनपद के अहरौरा स्थित खप्पर बाबा आश्रम में हुआ गैंगवार भी इसी इतिहास की एक चर्चित घटना है। इस वारदात में 50 हजार रुपये का इनामी राजेश चौधरी अपने दो साथियों के साथ मारा गया था। राजेश, कृपा चौधरी का दामाद था, जिसे यूपी एसटीएफ ने वर्ष 2006 में मुंबई में मुठभेड़ के दौरान मार गिराया था।
राजेश चौधरी के साथ मारे गए कल्लू पांडेय ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी और वह दौलतपुर के एक प्रतिष्ठित परिवार से जुड़ा था। पढ़ाई-लिखाई और बेहतर भविष्य की संभावनाओं के बावजूद उसका नाम भी आपराधिक घटनाक्रम से जुड़ गया।
इस गैंगवार में हत्या के आरोपियों के रूप में सामने आए अमजद और पिंटू भी बाद में प्रयागराज में एसटीएफ के साथ मुठभेड़ में मारे गए। इस मामले में 50 हजार रुपये का इनामी अजीम डॉक्टर फरार बताया गया था।
माफिया बनने का सपना, लेकिन जिंदगी का सफर बीच में ही खत्म
वर्ष 2014 में कमच्छा स्थित शराब की दुकान के पास हेमंत मौर्य पुलिस मुठभेड़ में मारा गया था। जुलाई 2015 में अपराध जगत में बड़ा नाम बनने की चाह रखने वाले सनी सिंह को कबीरचौरा इलाके में यूपी एसटीएफ ने मुठभेड़ में मार गिराया।
नवंबर 2020 में मोनू चौहान और रोशन गुप्ता उर्फ किट्टू की मौत अपराध जगत से जुड़ी एक अन्य बड़ी घटना रही। वर्ष 2021 में एक लाख रुपये के इनामी दीपक वर्मा को एसटीएफ ने चौबेपुर क्षेत्र में मुठभेड़ के दौरान मार गिराया। इसके करीब एक वर्ष बाद दो लाख रुपये का इनामी मनीष सिंह उर्फ सोनू लोहता क्षेत्र में एसटीएफ के साथ मुठभेड़ में मारा गया।
वर्ष 2018 में रईस बनारसी की भी बदमाशों के बीच हुई गोलीबारी में मौत हो गई थी।
इन घटनाओं के अलग-अलग कारण और परिस्थितियां थीं, लेकिन एक समान पहलू यह रहा कि अपराध की दुनिया में प्रभाव और दबदबा स्थायी साबित नहीं हुआ।
लूट के माल का बंटवारा बना मौत की वजह, सड़क के नीचे दफन मिली लाश
बनारस के आपराधिक इतिहास की सबसे मार्मिक घटनाओं में वर्ष 2012 का वह मामला भी शामिल है, जिसमें अभिषेक हनी गैंग से जुड़े लोगों के बीच लूट के माल के बंटवारे को लेकर विवाद हुआ था।
विवाद इतना बढ़ा कि रंजीत गौड़ उर्फ बाडू और एक अन्य युवक की हत्या कर दी गई। बाद में दोनों के शव निर्माणाधीन सड़क के नीचे दफना दिए गए।
रंजीत का परिवार बेहद साधारण आर्थिक परिस्थितियों में जीवन बिताता था। उसके पिता रिक्शा चलाकर परिवार का भरण-पोषण करते थे, जबकि मां कपड़े धोकर घर चलाने में मदद करती थीं। बेटे के लापता होने के बाद मां महीनों तक अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर लगाती रही।
आखिरकार जब बेटे का पता चला, तो उसकी लाश सड़क के नीचे से जेसीबी की मदद से निकाली गई। शव की हालत इतनी खराब थी कि उसकी पहचान करना भी मुश्किल हो गया था।
जिस इकलौते बेटे से माता-पिता को बुढ़ापे में सहारे की उम्मीद थी, उसी की मौत ने उनके जीवन को गहरे दुख में डुबो दिया। यह घटना केवल एक हत्या की कहानी नहीं, बल्कि उस परिवार की त्रासदी है, जिसने अपने बेटे के लिए कुछ और सपने देखे थे।
खौफ का साम्राज्य नहीं देता सुरक्षा, अपराध छोड़ जाता है सिर्फ पछतावा
बनारस और आसपास के इलाकों में बीते वर्षों के आपराधिक घटनाक्रम पर नजर डालें तो एक बात स्पष्ट दिखाई देती है—अपराध की दुनिया में बनाई गई पहचान और हासिल किया गया दबदबा जीवनभर साथ नहीं चलता। कहीं गैंग के भीतर की दुश्मनी जान ले लेती है, कहीं पुरानी रंजिश मौत का कारण बनती है और कहीं पुलिस कार्रवाई में अपराधियों का सफर समाप्त हो जाता है।
इन घटनाओं का दूसरा पहलू उन परिवारों की पीड़ा है, जिनके अपने गलत रास्ते पर चल पड़े। अपराध में शामिल व्यक्ति के अंत के साथ ही कई बार उसके परिवार की आर्थिक और सामाजिक मुश्किलें भी बढ़ जाती हैं।
बंदूक के दम पर पहचान बनाने का सपना देखने वाले युवाओं के लिए बनारस के अपराध जगत की ये घटनाएं एक कड़ा सबक हैं। गलत रास्ता कुछ समय के लिए रुतबा दे सकता है, लेकिन उसका अंजाम जिंदगी, परिवार और भविष्य—तीनों को तबाह कर सकता है।




