
- रिपोर्ट: प्राची सिंह
नई दिल्ली: NEET छात्र आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और सभी राज्य सरकारों को कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए। अदालत ने कहा कि जिन 18 वर्ष से कम आयु के प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार या हिरासत में लिया गया है और जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उन्हें तत्काल रिहा किया जाए। साथ ही आंदोलन से जुड़े सभी डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के भी निर्देश दिए गए।
पुलिस कार्रवाई की होगी निष्पक्ष जांच
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कथित ज्यादतियों के आरोप गंभीर हैं और उनकी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच आवश्यक है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी भी पक्ष—चाहे प्रदर्शनकारी हो या पुलिसकर्मी—ने कानून अपने हाथ में लिया है, तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
‘प्रोटोकॉल टूटा तो कानून करेगा कार्रवाई’
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब भी निर्धारित प्रोटोकॉल का उल्लंघन होता है, कानून को निष्पक्ष रूप से अपना काम करना चाहिए। अदालत की प्रारंभिक टिप्पणी के अनुसार, यह मामला किसी स्वतंत्र आयोग से पारदर्शी जांच कराए जाने योग्य प्रतीत होता है। अदालत ने कहा कि ऐसी जांच भविष्य में बड़े आंदोलनों से निपटने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार करने में भी सहायक होगी।
डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित राज्यों को निर्देश दिया कि आंदोलन से जुड़े सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, फेशियल रिकग्निशन सिस्टम के डेटा और अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखा जाए। अदालत ने यह भी कहा कि प्रदर्शनकारियों की निजी डिजिटल सामग्री या व्यक्तिगत डेटा को सार्वजनिक मंचों पर साझा नहीं किया जाना चाहिए।
जुनैद मलिक की याचिका पर अदालत की टिप्पणी
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने प्रदर्शनकारी स्वयंसेवक जुनैद मलिक की ओर से दायर याचिका का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि पुलिस ने उनके और उनके परिवार के साथ मारपीट की। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत के समक्ष प्रस्तुत सामग्री गंभीर आरोपों की ओर संकेत करती है, जिनकी गहन जांच आवश्यक है।
पुलिसकर्मियों पर हमलों की भी होगी जांच
केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यदि किसी पुलिसकर्मी ने अनुचित कार्रवाई की है तो उसके खिलाफ भी कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने अदालत को बताया कि आंदोलन के दौरान 250 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए हैं और इस पहलू की भी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि पुलिस पर हमला करने वाले लोग कौन थे। इस पर तुषार मेहता ने कहा कि प्रारंभिक आकलन के अनुसार पुलिस पर हमला छात्रों ने नहीं, बल्कि आंदोलन में घुस आए उपद्रवी तत्वों ने किया हो सकता है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने भी कहा कि कुछ असामाजिक तत्वों की गतिविधियों के आधार पर पूरे शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन को हिंसक नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि निष्पक्ष जांच के बाद ही वास्तविक जिम्मेदारों की पहचान होनी चाहिए।




