
Prayagraj. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महिला सरकारी कर्मचारियों के मातृत्व अवकाश को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी महिला कर्मचारी की पहले से दो या उससे अधिक जीवित संतानें हैं, तो उसे मातृत्व अवकाश का लाभ नहीं दिया जा सकता। यह प्रतिबंध उस स्थिति में भी लागू होगा, जब महिला अपने सेवाकाल में पहली बार मातृत्व अवकाश की मांग कर रही हो।
चौथी संतान के लिए मांगा था मातृत्व अवकाश
यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने शशि कुमारी की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। याचिकाकर्ता ने 19 जून 2026 को जारी विभागीय आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी चौथी संतान के जन्म के लिए मातृत्व अवकाश देने से इनकार कर दिया गया था।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने अपने पहले तीन बच्चों के जन्म के समय मातृत्व अवकाश का लाभ नहीं लिया था। ऐसे में चौथी संतान के लिए पहली बार छुट्टी मांगे जाने पर इसे अस्वीकार करना उचित नहीं है।
सरकार ने नियमों का दिया हवाला
राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए संबंधित सेवा नियमों का हवाला दिया। सरकार की ओर से बताया गया कि प्रसूति अवकाश प्रसव की तारीख से 180 दिनों तक स्वीकृत किया जाता है और दो मातृत्व अवकाश के बीच कम से कम दो वर्ष का अंतर होना जरूरी है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि नियमों के अनुसार यदि किसी महिला कर्मचारी की दो या अधिक जीवित संतानें हैं, तो उसे मातृत्व अवकाश नहीं दिया जा सकता।
गर्भपात की स्थिति में अलग अवकाश का प्रावधान
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि गर्भपात की स्थिति में महिला सरकारी कर्मचारियों के लिए छह सप्ताह के विशेष अवकाश का प्रावधान है। वर्ष 1990 में जारी अधिसूचना के माध्यम से इस अवकाश पर पहले लागू अधिकतम तीन बार की सीमा को भी समाप्त कर दिया गया था।
दस्तावेजों में भी मिली खामियां
अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान याचिका के साथ लगाए गए दस्तावेजों पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने पाया कि मूल दस्तावेजों की फोटोकॉपी के स्थान पर टाइप की गई प्रतियां दाखिल की गई थीं, जिनमें कई टाइपिंग संबंधी त्रुटियां थीं।
सभी पक्षों की दलीलें और संबंधित नियमों को देखने के बाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दो या उससे अधिक जीवित संतान वाली महिला सरकारी कर्मचारी मातृत्व अवकाश की पात्र नहीं होगी। कोर्ट ने इसी आधार पर याचिका को राहत देने से इनकार कर दिया।





