
- हथौड़ा चलाने में देरी या जेब भरने की तेजी ? डालीगंज की अवैध इमारतों का राज
- रिपोर्ट: अनुराग सिंह बिष्ट
लखनऊ: लखनऊ विकास प्राधिकरण के एलडीए प्रवर्तन जोन-4 डालीगंज क्षेत्र में इन दिनों इंजीनियरिंग का एक अद्भुत करिश्मा देखने को मिल रहा है। यहाँ कानून की किताब और धरातल की हकीकत के बीच उतना ही फासला है जितना लखनऊ की तपती धूप और साहबों के एयर-कंडीशंड दफ्तरों के बीच।
- डालीगंज चर्च के सामने हो रहा निर्माण साहबों की नज़रों से इतना छोटा है कि दिखाई नहीं दे रहा?
- नोटिस जारी होने के 15 दिन बाद की समय-सीमा क्या सिर्फ कागजों की शोभा बढ़ाने के लिए है?
- मुख्यमंत्री के जीरो टॉलरेंस के आदेशों को प्रवर्तन जोन-4 की फाइलों में किसने कैद कर रखा है?
लखनऊ विकास प्राधिकरण के शूरवीर अधिकारियों ने कागजी घोड़े दौड़ाने की कला में इतनी महारत हासिल कर ली है कि डालीगंज रोड पर चर्च के सामने और कदम रसूल वार्ड में खड़ी होती अवैध इमारतें उन्हें दिखाई ही नहीं देतीं। शायद साहबों के चश्मों का नंबर सिर्फ फाइलों पर हस्ताक्षर करने तक ही सीमित है।

नियम तो कहता है कि नोटिस के 15 दिन बाद हथौड़ा चलना चाहिए, लेकिन यहाँ तो मोटी रकम का ऐसा मरहम लगाया जाता है कि साहबों की याददाश्त ही जवाब दे जाती है। महीनों बीत जाते हैं, ईंट पर ईंट जुड़ती रहती है, लेकिन सीलिंग की कार्रवाई का मुहूर्त नहीं निकल पाता। ऐसा लगता है जैसे एलडीए ने भ्रष्टाचार के दलदल में कमल खिलाने की ठान ली है।
एक तरफ मुख्यमंत्री जीरो टॉलरेंस की बात करते हैं, तो दूसरी तरफ एलडीए के जोनल अधिकारी अपने आलीशान ऑफिसों में बैठकर उन आदेशों को ठेंगा दिखाने का कीर्तिमान रच रहे हैं। जनता बेचारी मुंगेरीलाल के हसीन सपने देख रही है कि कभी तो कानून का राज होगा, मगर बिल्डरों और अधिकारियों की जुगलबंदी के आगे जनता की उम्मीदें तो बीमार हो चुकी हैं।
अब देखना यह है कि ये कागजी घोड़े कब तक धूल उड़ाएंगे या फिर हर बार की तरह खानापूर्ति की चादर ओढ़कर इस मुद्दे को भी दफन कर दिया जाएगा।




