
उत्तर प्रदेश। नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट (NSI) परिसर में 600 से अधिक पेड़ों की कथित अवैध कटाई और उखाड़े जाने के मामले में पुलिस ने बड़ा कदम उठाते हुए संस्थान की निदेशक समेत कई लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है। इस मामले ने पर्यावरण संरक्षण और संस्थान की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पुलिस के अनुसार, यह FIR क्षेत्रीय वन अधिकारी राकेश पांडे की शिकायत पर दर्ज की गई है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि NSI परिसर के गेट नंबर-5 के निकट बिना आवश्यक अनुमति के बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की गई, जिससे पर्यावरण और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचने की आशंका है।
मामले में NSI की निदेशक सीमा परोहा, प्राइवेट सिक्योरिटी कमांडर उदय प्रताप सिंह राठौर, एस्टेट ऑफिसर विनय कुमार, फार्म मैनेजर अशोक कुमार, अनवरगंज स्थित मेसर्स तिवारी वुड मर्चेंट तथा कुछ अज्ञात व्यक्तियों को नामजद किया गया है। पुलिस भारतीय वन अधिनियम और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े प्रावधानों के तहत जांच कर रही है।
आरोप है कि संस्थान प्रशासन ने वन विभाग की अनुमति के बिना पेड़ों की कटाई कराई। वहीं, अन्य कर्मचारियों पर इस प्रक्रिया में सहयोग करने और कथित अवैध गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया गया है। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि कटे हुए पेड़ों को हटाने और उनके निस्तारण में किन लोगों की भूमिका रही।
सूत्रों के मुताबिक, तिवारी वुड मर्चेंट का नाम इस आधार पर शामिल किया गया है कि उन्होंने परिसर से कटे हुए पेड़ों को ले जाने और उनके निपटान में सहयोग किया। पुलिस ने मामले में गवाहों और संस्थान के कर्मचारियों से पूछताछ शुरू कर दी है।
घटना सामने आने के बाद स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं में नाराजगी है। कई सामाजिक संगठनों और एनजीओ ने मामले की निष्पक्ष और विस्तृत जांच की मांग की है। उनका कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई से परिसर के पर्यावरणीय संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
वन विभाग ने बताया कि जल्द ही विशेषज्ञों की एक तकनीकी टीम मौके का निरीक्षण करेगी और पेड़ों के नुकसान का आकलन कर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगी। रिपोर्ट के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
फिलहाल, NSI प्रशासन की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि पेड़ों की कटाई किस उद्देश्य से की गई और इसके पीछे किसी आर्थिक या प्रशासनिक लाभ की मंशा तो नहीं थी।




