
-जुए के अड्डों तक पहुंच कितनी गहरी? कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति या किसी बड़े नेटवर्क पर पर्दा?
- पंकज झा की कलम से ✍🏻
पत्रकारिता सिर्फ खबर लिख देने का नाम नहीं है। पत्रकारिता वह जिम्मेदारी है, जिसमें कलम समाज के सामने सच रखने का साहस करती है और उन सवालों को उठाती है, जिन्हें अक्सर दबाने की कोशिश की जाती है। लेकिन जब पत्रकारिता की पहचान को ही ढाल बनाकर कोई व्यक्ति जुए के अड्डों, अवैध कारोबार या संदिग्ध गतिविधियों के आसपास मंडराता दिखाई दे, तो सवाल उठना लाजिमी है—आखिर कलम सच के लिए चल रही है या किसी स्वार्थ के लिए?
जुआ महज रुपयों का खेल नहीं। इसके पीछे कई परिवारों की बर्बादी, कर्ज, आर्थिक संकट और अपराध की बढ़ती प्रवृत्ति छिपी होती है। इसलिए ऐसे अवैध कारोबार के खिलाफ आवाज उठाना समाज और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी है। पत्रकार का दायित्व तो और भी बड़ा है—वह अंधेरे में छिपे खेल को उजागर करे, न कि उसी अंधेरे के इर्द-गिर्द अपने हित तलाशे।
पत्रकारिता और सौदेबाजी के बीच की रेखा आखिर कितनी साफ है?
पत्रकार की असली ताकत उसका प्रेस कार्ड नहीं, उसकी विश्वसनीय कलम होती है। खबर प्रकाशित करना, रोकना या दबाना—इन सबको यदि किसी निजी लाभ, दबाव या सौदेबाजी के लिए इस्तेमाल किया जाने लगे, तो यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि पत्रकारिता की साख पर सवाल है।
सवाल सीधा है—यदि किसी अवैध गतिविधि की जानकारी सामने आती है, तो उसे निष्पक्ष तरीके से उजागर किया जाना चाहिए या फिर उसके नाम पर दबाव बनाने और निजी हित साधने की कोशिश होनी चाहिए?
कलम खबर की आवाज बने, किसी अवैध धंधे की ढाल नहीं।
जब कानून की पकड़ कमजोर पड़ती है, तब अपराध का नेटवर्क मजबूत होता है
काशी के अलग-अलग इलाकों में अवैध जुए के संचालन को लेकर समय-समय पर शिकायतें और चर्चाएं सामने आती रही हैं। सवाल यह है कि यदि आर्थिक तंगी और बेरोजगारी से जूझ रहे कुछ युवक अचानक ऐसे कारोबार से लाखों रुपये प्रतिदिन कमाने लगें, तो इस पूरे खेल के पीछे आखिर कौन-सा नेटवर्क काम कर रहा है?
क्या यह केवल कुछ लोगों तक सीमित गतिविधि है?
या फिर इसके पीछे कोई बड़ा संरक्षण तंत्र मौजूद है?
अगर अवैध कारोबार खुले तौर पर चल रहा है, तो यह जांच का विषय है कि इसकी जानकारी किस-किस स्तर तक पहुंचती है और कार्रवाई के बावजूद यह खेल दोबारा कैसे खड़ा हो जाता है।
सिगरा से लंका तक सवाल एक—अवैध जुए का असली संचालक कौन?
सिगरा, रोहनिया, कैंट, लंका, आदमपुर, चेतगंज सहित शहर के जिन इलाकों को लेकर जुए के अवैध कारोबार की शिकायतें और चर्चाएं सामने आती रही हैं, वहां निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की जरूरत है।
मुद्दा किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने का नहीं है।
मुद्दा यह है कि यदि कहीं अवैध जुए का संचालन हो रहा है, तो उसका नेटवर्क कितना बड़ा है? पैसा कहां से आता है? कहां जाता है? संरक्षण किसका है? और कार्रवाई बार-बार छोटे खिलाड़ियों तक ही क्यों सिमट जाती है?
इन सवालों का जवाब जांच से ही सामने आ सकता है।
क्या कार्रवाई सिर्फ मोहरों तक सीमित है?
अक्सर अवैध कारोबार पर कार्रवाई होती है, कुछ लोग पकड़े जाते हैं और कुछ समय बाद मामला शांत हो जाता है। लेकिन यदि उसी जगह या उसी नेटवर्क से जुड़ी गतिविधियां फिर सामने आने लगें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या कार्रवाई सिर्फ दिखावे तक सीमित है, या वास्तव में पूरे नेटवर्क तक पहुंचने की कोशिश हो रही है?
किसी भी अवैध कारोबार पर प्रभावी कार्रवाई तभी संभव है, जब केवल सामने दिखाई देने वाले लोगों पर नहीं, बल्कि उसके पूरे तंत्र पर नजर डाली जाए।
प्रेस कार्ड सवालों से ऊपर नहीं हो सकता
समाज में पत्रकार की भूमिका महत्वपूर्ण है और पत्रकारिता की स्वतंत्रता लोकतंत्र की ताकत है। लेकिन यही स्वतंत्रता जिम्मेदारी भी मांगती है।
यदि कोई व्यक्ति पत्रकारिता की पहचान का इस्तेमाल किसी अवैध गतिविधि से जुड़े लोगों के साथ संबंधों, दबाव या निजी हितों के लिए करता है, तो उसके बारे में सवाल उठना स्वाभाविक है।
प्रेस कार्ड किसी को कानून से ऊपर नहीं करता और कलम किसी अवैध गतिविधि का लाइसेंस नहीं हो सकती।
काशी की पत्रकारिता को अपनी विरासत बचानी होगी
काशी की पत्रकारिता की अपनी गौरवशाली परंपरा रही है। यहां की कलम ने हमेशा सत्ता, व्यवस्था और समाज से कठिन सवाल पूछे हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि पत्रकारिता को वसूली, दबाव, दलाली और सौदेबाजी जैसी प्रवृत्तियों से पूरी तरह अलग रखा जाए।
अपराधी अपराध करता है तो कानून को अपना काम करना चाहिए।
और यदि पत्रकारिता के नाम पर कोई गलत दबाव बनाने की कोशिश करता है, तो उस पर भी सवाल उठने चाहिए।
क्योंकि सच्ची पत्रकारिता किसी के खिलाफ नहीं होती—वह सच के पक्ष में होती है।
अब जरूरत है कि जुए की मेज पर बजते सिक्कों की आवाज से आगे बढ़कर उस पूरे नेटवर्क की पड़ताल हो, जो इस अवैध कारोबार को चलाता है।
जांच हो।
निष्पक्ष जांच हो।
और कार्रवाई यदि हो, तो केवल छोटे खिलाड़ियों पर नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क पर हो।
क्योंकि जुए की मेज पर सिक्कों की खनक और पत्रकार की कलम की आवाज कभी एक जैसी नहीं हो सकती।
पत्रकार खबर का पहरेदार है, किसी अवैध धंधे का हिस्सेदार नहीं।
दलाली का रास्ता वसूली तक जाता है—पत्रकारिता का रास्ता सच तक।
अब वक्त है कि काशी की कलम फिर वही सवाल पूछे, जिनसे व्यवस्था को जवाब देना पड़े—
*जुए की इस खनक के पीछे आखिर कौन है?
कानून की खामोशी क्यों है?
और कार्रवाई अगर हो रही है, तो बड़े चेहरे अब तक सामने क्यों नहीं आए?**




