
- रिपोर्ट: अनुराग सिंह बिष्ट
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट की हालिया टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया पर फैल रही भ्रामक जानकारियों के बीच स्थिति स्पष्ट की गई है। बताया गया है कि अदालत ने डिजिटल मीडिया या यूट्यूब पत्रकारों पर किसी प्रकार का नया प्रतिबंध नहीं लगाया है और न ही सभी डिजिटल पत्रकारों की जांच के आदेश दिए हैं।
स्पष्टीकरण में कहा गया है कि दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी को गलत संदर्भ में प्रस्तुत किया जा रहा है। अदालत की ओर से ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया गया है, जिसके आधार पर सभी डिजिटल पत्रकारों को संदेह के दायरे में माना जाए।
यह भी स्पष्ट किया गया है कि केवल अदालत की टिप्पणी के आधार पर किसी डिजिटल पत्रकार को “फर्जी पत्रकार” नहीं कहा जा सकता और न ही उसके खिलाफ स्वतः कोई कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। किसी भी प्रकार की कार्रवाई के लिए विधिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक है, जिसमें शिकायत, साक्ष्य और कानूनी आधार होना अनिवार्य है।
हालांकि, यदि कोई व्यक्ति फर्जी प्रेस कार्ड का इस्तेमाल करता है, वसूली, धोखाधड़ी या किसी अन्य आपराधिक गतिविधि में संलिप्त पाया जाता है, तो उसके खिलाफ प्रचलित कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
डिजिटल पत्रकारों और मीडिया से जुड़े लोगों से अपील की गई है कि वे सोशल मीडिया पर प्रसारित अपुष्ट या भ्रामक सूचनाओं पर विश्वास करने के बजाय केवल आधिकारिक आदेशों और न्यायालय के वास्तविक निर्णयों पर ही भरोसा करें।




