
- रिपोर्ट: पंकज झा
किशोरावस्था जीवन का वह संवेदनशील पड़ाव है, जिसमें बच्चे शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक बदलावों से गुजरते हैं। इस उम्र में उन्हें सिर्फ समझाने की जरूरत नहीं, बल्कि साथ खड़े होने, सही दिशा दिखाने और समर्थन देने की आवश्यकता होती है। यही वह समय है जब अभिभावक बच्चों के व्यक्तित्व और भविष्य की दिशा तय करने में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं।
- किशोरावस्था में बदलाव:
-शारीरिक परिवर्तन – ऊंचाई और वजन बढ़ना, सेक्सुअल मेच्योरिटी, जल्दी चिड़चिड़ा होना, बड़े की बातों को नज़रअंदाज़ करना और पीरियड्स की शुरुआत जैसे बदलाव बच्चों के जीवन में नए पड़ाव की शुरुआत बताते हैं।
-मानसिक परिवर्तन – किशोर अधिक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं, उनकी सोच और दृष्टिकोण में बदलाव आता है।
-भावनात्मक परिवर्तन – इस उम्र में बच्चे भावनात्मक रूप से संवेदनशील होते हैं, उन्हें अपने भावनाओं को संभालने में मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।
- अभिभावकों की जिम्मेदारी:
-संवाद की शुरुआत: बच्चों के साथ खुलकर बातचीत करें, उन्हें अपनी बात कहने का अवसर दें और जीवन के प्रति सजग रहने की सलाह दें।
-समर्थन और प्रोत्साहन: बच्चों के प्रयासों को सराहें और उनके सपनों को उड़ान देने में मदद करें।
-सही दिशा देना: जीवन मूल्यों और नैतिकता को समझाएं, सही और गलत में अंतर बताएं। मोबाइल व इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के बीच उन्हें सही निर्णय लेने में मार्गदर्शन करें।
-शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य: बच्चों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करें और साथ में उदाहरण पेश करें।
-प्यार और समझ: बच्चों को यह महसूस कराएं कि आप हर परिस्थिति में उनके साथ हैं। डॉक्टर अनामिका द्विवेदी ने वाराणसी के भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार संघ के जिला अध्यक्ष को बताया कि किशोरावस्था में अभिभावकों का सही मार्गदर्शन न केवल बच्चों को उनके सपनों की ओर ले जाता है, बल्कि उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए आत्मविश्वास और साहस भी प्रदान करता है। आइए, अपने बच्चों के साथ खड़े होकर उन्हें उज्ज्वल भविष्य की दिशा में आगे बढ़ने में मदद करें।




