
Chandigarh: पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले शिरोमणि अकाली दल (SAD) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच दोबारा गठबंधन की संभावनाओं को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। दोनों दल पहले लंबे समय तक सहयोगी रहे हैं, लेकिन सितंबर 2020 में कृषि कानूनों के विरोध के बाद अकाली दल ने एनडीए से नाता तोड़ लिया था। अब दोनों पार्टियों के बीच फिर से राजनीतिक नजदीकी बढ़ने की चर्चाएं हैं। हालांकि, गठबंधन को लेकर अभी तक किसी भी दल ने आधिकारिक घोषणा नहीं की है।
सीटों के बंटवारे पर बातचीत की चर्चा
मीडिया रिपोर्टों और राजनीतिक सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि दोनों दलों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत चल रही है। भाजपा इस बार पुराने समझौते के मुकाबले अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है।
कुछ रिपोर्टों में भाजपा की ओर से 45 से 50 सीटों की मांग किए जाने की बात कही गई है, जबकि अन्य चर्चाओं में 40 से 47 सीटों का आंकड़ा सामने आया है। पंजाब विधानसभा में कुल 117 सीटें हैं। सीटों के बंटवारे और मुख्यमंत्री पद को लेकर अभी कोई आधिकारिक सहमति सामने नहीं आई है।
1997 से 2017 तक साथ रहा था अकाली दल-भाजपा गठबंधन
अकाली दल और भाजपा का गठबंधन पंजाब की राजनीति में लंबे समय तक प्रभावशाली रहा। वर्ष 1997 से 2017 तक दोनों दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा। पुराने सीट बंटवारे के फॉर्मूले के तहत भाजपा 23 विधानसभा सीटों पर और अकाली दल 94 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारता था।
सितंबर 2020 में कृषि कानूनों के विरोध में अकाली दल ने एनडीए छोड़ दिया था। इसके बाद दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ती रही हैं। अब 2027 के चुनाव से पहले गठबंधन की संभावनाओं ने फिर राजनीतिक चर्चा को तेज कर दिया है।
दिवाली के बाद बठिंडा में घोषणा की अटकलें
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि दिवाली के बाद गठबंधन को लेकर स्थिति स्पष्ट हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बठिंडा में संभावित रैली को लेकर भी खबरें सामने आई हैं। कुछ रिपोर्टों में इस रैली को गठबंधन की घोषणा से जोड़कर देखा जा रहा है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के पंजाब में 2027 के बाद एनडीए सरकार बनने संबंधी बयानों ने भी इन अटकलों को हवा दी है। हालांकि, प्रधानमंत्री की रैली और गठबंधन की औपचारिक घोषणा को लेकर अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
अकाली दल के अलग हुए गुटों की भूमिका पर भी नजर
संभावित गठबंधन में अकाली दल से अलग हुए नेताओं और गुटों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। इनमें अकाली दल पुनर्सुरजीत जैसे गुटों का नाम चर्चा में है। हालांकि, इन गुटों को गठबंधन में शामिल किए जाने पर अभी कोई स्पष्ट सहमति सामने नहीं आई है।
चुनाव आयोग में पंजीकरण और चुनाव चिह्न से जुड़े मुद्दे भी ऐसे गुटों के लिए चुनौती बन सकते हैं। लिहाजा, गठबंधन की तस्वीर स्पष्ट होने के साथ इनकी भूमिका पर भी स्थिति साफ होने की उम्मीद है।
हरसिमरत कौर बादल की केंद्रीय मंत्रिमंडल में वापसी की चर्चा
अकाली दल और भाजपा के बीच दोबारा गठबंधन होने की स्थिति में केंद्र की राजनीति में भी नए समीकरण बनने की अटकलें हैं। इसी कड़ी में अकाली दल की सांसद हरसिमरत कौर बादल की केंद्रीय मंत्रिमंडल में वापसी की चर्चा भी हो रही है।
हरसिमरत कौर बादल सितंबर 2020 तक मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री थीं। कृषि कानूनों के विरोध में अकाली दल के एनडीए से अलग होने के बाद उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। हालांकि, उनकी दोबारा मंत्री बनने को लेकर अभी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है। हरसिमरत कौर ने हालिया बातचीत में यह भी स्पष्ट किया है कि उन्होंने भाजपा-अकाली गठबंधन का कोई संकेत नहीं दिया है।
सुखबीर बादल ने गठबंधन के रास्ते खुले रखने की बात कही
शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने अपने हालिया बयानों में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को प्रमुख राजनीतिक विरोधी बताया है। उन्होंने यह भी कहा है कि जिन दलों की विचारधारा अकाली दल से मेल खाती है, उनके साथ गठबंधन के रास्ते खुले हैं।
फिलहाल पंजाब की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 2027 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल और भाजपा एक बार फिर साथ आएंगे? दोनों दलों के बीच बातचीत और सीटों के बंटवारे को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच अब सबकी नजर उनके आधिकारिक रुख पर है।




