
- पंकज झा की कलम से ✍️
Varanasi: श्री काशी विश्वनाथ धाम से जुड़े एक वायरल वीडियो ने मंदिर की व्यवस्था और श्रद्धालुओं को दर्शन कराने के नाम पर चल रही कथित गतिविधियों को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वीडियो में एक शख्स को करीब 25 सेकेंड तक बाबा विश्वनाथ के शिवलिंग को स्पर्श करते हुए देखा जा रहा है। लेकिन वीडियो में मंदिर परिसर के भीतर दिखाई दे रही बैरिकेडिंग ने पूरे मामले को और रहस्यमय बना दिया है।
दरअसल, आम श्रद्धालुओं के लिए जब बाबा विश्वनाथ का स्पर्श दर्शन कराया जाता है, उस दौरान इस तरह की बैरिकेडिंग दिखाई नहीं देती। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह वीडियो आखिर किस समय और किन परिस्थितियों में बनाया गया? क्या किसी विशेष व्यवस्था के तहत उस व्यक्ति को इतनी देर तक शिवलिंग स्पर्श करने की अनुमति मिली थी? अगर अनुमति मिली थी तो किस आधार पर? और यदि नहीं मिली थी तो मंदिर की सुरक्षा एवं व्यवस्था के बीच यह संभव कैसे हुआ?
इन सवालों का जवाब अभी सामने आना बाकी है। पूरे मामले में मंदिर प्रशासन के आधिकारिक स्पष्टीकरण का इंतजार है।
लेकिन इस वीडियो ने एक और बड़ी बहस को जन्म दे दिया है—क्या बाबा के दरबार में दर्शन अब सिर्फ आस्था का विषय रह गया है, या उसके नाम पर प्रभाव और पहुंच का एक अलग तंत्र भी खड़ा हो गया है?
चर्चा और आरोपों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि कथित पीआरओ समेत कई लोग दर्शन कराने और करवाने के नाम पर कथित रूप से मालामाल हो रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ निष्कर्ष निकालना आधिकारिक जांच के बिना उचित नहीं होगा।
फिर भी सवाल छोटा नहीं है।
- कौन श्रद्धालु है और कौन ‘व्यवस्था’ के नाम पर विशेष पहुंच हासिल कर रहा है?
- किसे आम कतार में खड़ा होना पड़ता है और किसके लिए नियम बदल जाते हैं?
- दर्शन की व्यवस्था में पारदर्शिता कितनी है?
और सबसे बड़ा सवाल—
- क्या बाबा के दरबार में पहुंच भी अब हैसियत देखकर तय होने लगी है?
काशी की आस्था में बाबा विश्वनाथ का स्थान किसी परिचय, पद या प्रभाव से ऊपर है। यहां आने वाला हर श्रद्धालु अपने मन में यही विश्वास लेकर आता है कि बाबा सबके हैं और सबको समान रूप से स्वीकार करते हैं। ऐसे में अगर किसी को विशेष सुविधा मिलती है, तो उसके पीछे का कारण भी उतना ही साफ और सार्वजनिक होना चाहिए।
कहा जा रहा है कि कई लोगों ने मंदिर को ही अपना ‘घर’ बना लिया है और कुछ लोग अघोषित पीआरओ की भूमिका निभाते नजर आते हैं। अगर यह केवल आरोप हैं तो प्रशासन को जांच कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और यदि कहीं व्यवस्था की आड़ में कोई अनधिकृत लाभ या वसूली का खेल चल रहा है, तो उस पर कठोर कार्रवाई भी होनी चाहिए।
क्योंकि सवाल केवल एक वायरल वीडियो का नहीं है।
सवाल उस भरोसे का है, जिसे लेकर देश-दुनिया से करोड़ों श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ के दरबार में पहुंचते हैं।
बाहर की दुनिया में आस्था के नाम पर होने वाली कथित लूट पर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन अगर वही शिकायतें बाबा के अपने दरबार की व्यवस्था से जुड़ने लगें, तो यह महज प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं की भावनाओं से जुड़ा बेहद संवेदनशील विषय बन जाता है।
फिलहाल वायरल वीडियो की परिस्थितियों, बैरिकेडिंग और संबंधित व्यक्ति को मिले स्पर्श दर्शन की वास्तविकता पर आधिकारिक तस्वीर सामने आना बाकी है। मंदिर प्रशासन यदि पूरे मामले पर पारदर्शी स्पष्टीकरण देता है, तो तमाम सवालों का जवाब मिल सकता है।
और आखिर में बस इतना—
विश्वनाथ के दरबार में किसी की सिफारिश नहीं, बाबा की कृपा चलती है।
क्योंकि बाहर चाहे कितने ही ‘नाथ’ बन जाएं,
काशी में अंतिम सत्ता तो एक ही है—
बाबा विश्वनाथ।
बाकी… विश्वनाथ तो सबके नाथ हैं।





