
-आकर्षक विद्युत सजावट से चौराहे की बढ़ी थी रौनक, अब बंद पड़ी डमरू लाइट बनी नगर निगम और प्रशासन की अनदेखी का उदाहरण, स्थानीय लोगों ने उठाई दोबारा रोशन करने की मांग*
- पंकज झा की कलम ✍️
वाराणसी। धर्म और संस्कृति की नगरी काशी की खूबसूरती बढ़ाने के लिए शहर के प्रमुख चौराहों और सार्वजनिक स्थलों को आकर्षक विद्युत सजावट से सजाया जाता है। इसी क्रम में शहर के अति व्यस्त लहुराबीर चौराहे पर बाबा विश्वनाथ के डमरू की आकृति वाली आकर्षक डमरू लाइट लगाई गई थी। इसकी खूबसूरत बनावट और जगमगाती रोशनी ने चौराहे की सुंदरता में चार चांद लगा दिए थे। रात के समय यह लाइट राहगीरों, श्रद्धालुओं और शहरवासियों के आकर्षण का केंद्र बनी रहती थी। लेकिन अब इसकी रोशनी बुझ चुकी है और खूबसूरती बढ़ाने वाली यह आकर्षक सजावट महज एक शोपीस बनकर रह गई है।
काशी की धार्मिक पहचान और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाने वाली डमरू की यह आकृति शहर की सुंदरता में अलग ही छटा बिखेर रही थी। शाम होते ही जब इसकी रोशनी जगमगाती थी, तो चौराहे का नजारा देखते ही बनता था। बाहर से आने वाले पर्यटक और स्थानीय नागरिक भी इसकी खूबसूरती को निहारते थे। लेकिन अब स्थिति यह है कि डमरू लाइट लगी तो है, मगर उसमें रोशनी नहीं है। ऐसे में चौराहे की सुंदरता बढ़ाने वाली यह व्यवस्था अपनी चमक खो चुकी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब इस आकर्षक लाइट को लगाने में व्यवस्था और संसाधनों का इस्तेमाल किया गया, तो फिर इसकी नियमित देखरेख और संचालन की जिम्मेदारी किसकी है? क्या शहर की सुंदरता केवल विशेष आयोजनों और विशिष्ट अतिथियों के आगमन तक ही सीमित रहनी चाहिए? क्या आयोजन समाप्त होने के बाद इस तरह की व्यवस्थाओं को यूं ही उपेक्षित छोड़ देना उचित है?
स्थानीय लोगों का कहना है कि लहुराबीर शहर का प्रमुख और बेहद व्यस्त चौराहा है। यहां से प्रतिदिन हजारों लोगों का आवागमन होता है। ऐसे में बाबा विश्वनाथ के डमरू की आकर्षक आकृति का अंधेरे में रहना शहर की सुंदरता को प्रभावित कर रहा है। लोगों का मानना है कि काशी की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी ऐसी सजावट का नियमित रखरखाव होना चाहिए, ताकि शहर की खूबसूरती लगातार बनी रहे।
स्थानीय नागरिकों ने नगर निगम और जिला प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों से मांग की है कि इस मामले को गंभीरता से लेते हुए डमरू लाइट को तत्काल दुरुस्त कराकर दोबारा चालू कराया जाए। साथ ही शहर के प्रमुख चौराहों पर लगाई गई सजावटी लाइटों की नियमित जांच, देखरेख और संचालन की जिम्मेदारी भी तय की जाए।
अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारियों की नजर लहुराबीर चौराहे पर बुझी पड़ी बाबा विश्वनाथ के डमरू की रोशनी पर कब पड़ती है और काशी की सुंदरता में चार चांद लगाने वाला यह डमरू एक बार फिर अपनी जगमगाहट से लोगों का ध्यान कब आकर्षित करता है।




