
-सुरक्षा के नाम पर घंटों थमती जिंदगी, जाम में फंसते मरीज और परेशान होते आम नागरिक; आखिर कब बदलेगी वीवीआईपी संस्कृति की तस्वीर?
- पंकज झा की कलम से✍️
वाराणसी। लोकतंत्र में सत्ता का उद्देश्य जनता की सेवा करना है, न कि जनता को अपने ही शहर की सड़कों पर बेबस खड़ा कर देना। लेकिन जब किसी वीवीआईपी के आगमन पर सड़कें बंद कर दी जाती हैं, यातायात रोक दिया जाता है और आम नागरिकों को घंटों इंतजार करना पड़ता है, तो एक सवाल व्यवस्था के सामने खड़ा हो जाता है—क्या किसी खास व्यक्ति की सुविधा, हजारों आम लोगों की जरूरतों से बड़ी हो गई है?
वीवीआईपी संस्कृति पर बहस नई नहीं है, लेकिन जब इसका असर आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है, तब यह केवल यातायात का मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि समान अधिकार, संवेदनशीलता और जवाबदेही का सवाल बन जाता है।
एक काफिले के इंतजार में कितनी जिंदगियां ठहर जाती हैं?
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में एक युवक अपने पिता को खोने की बात कहते हुए पुलिस से बातचीत करता दिखाई देता है। इस वीडियो के संदर्भ और पूरी परिस्थितियों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है, लेकिन इससे जुड़ा सवाल बेहद गंभीर है—जब रास्ते बंद होते हैं और यातायात लंबे समय तक बाधित रहता है, तब आम नागरिक की परेशानी का जिम्मेदार कौन होता है?
किसी मरीज को अस्पताल पहुंचना हो, किसी छात्र को परीक्षा केंद्र तक जाना हो, किसी कर्मचारी को समय पर काम पर पहुंचना हो या किसी परिवार को जरूरी यात्रा करनी हो—सड़क पर लगने वाला लंबा जाम हर किसी के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। आपातकालीन स्थिति में तो कुछ मिनटों की देरी भी बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि वीवीआईपी की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए आम नागरिकों की सुविधा का ध्यान रखने के लिए क्या पर्याप्त इंतजाम किए जाते हैं? क्या वैकल्पिक मार्गों की जानकारी समय रहते दी जाती है? क्या एंबुलेंस और अन्य आपातकालीन सेवाओं के लिए निर्बाध रास्ता सुनिश्चित किया जाता है?
पद बड़ा हो सकता है, लेकिन जनता के अधिकार छोटे नहीं
किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की सुरक्षा महत्वपूर्ण है। सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन भी जरूरी है। लेकिन सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य नागरिकों को असुरक्षित या असहाय बनाना नहीं, बल्कि सभी की सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिए।
लोकतंत्र में किसी व्यक्ति का पद उसे विशेष सुरक्षा व्यवस्था का अधिकार दे सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आम नागरिक की परेशानियों को अनदेखा कर दिया जाए। सड़कें किसी व्यक्ति या पद की निजी संपत्ति नहीं हैं। वे जनता की साझा संपत्ति हैं, जिन पर हर नागरिक की आवाजाही और जरूरतें जुड़ी हैं।
जब किसी काफिले के लिए रास्ते रोके जाते हैं, तब प्रशासन की जिम्मेदारी केवल सुरक्षा व्यवस्था संभालने तक सीमित नहीं रह जाती। उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि यातायात कम से कम प्रभावित हो, लोगों को समय रहते सूचना मिले और आवश्यक सेवाओं का संचालन बाधित न हो।
जनता सवाल पूछे तो उसे गलत क्यों समझा जाए?
लोकतंत्र में सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है। यदि किसी व्यवस्था के कारण लोगों को परेशानी होती है, तो उसके बारे में जानकारी मांगना या जवाबदेही की अपेक्षा करना गलत नहीं कहा जा सकता।
जनता यह जानना चाहती है कि यातायात कितनी देर रोका जाएगा, वैकल्पिक रास्ते कौन से होंगे, जाम की स्थिति में आपातकालीन वाहनों को कैसे निकाला जाएगा और आम लोगों की शिकायतों पर कौन ध्यान देगा।
इन सवालों को विरोध या अव्यवस्था के रूप में देखने के बजाय प्रशासनिक सुधार का अवसर माना जाना चाहिए। जनता की परेशानी सामने आए तो उसका समाधान तलाशना ही जिम्मेदार व्यवस्था की पहचान है।
वीवीआईपी सुरक्षा भी रहे, आम आदमी की जिंदगी भी न रुके
यह समझना जरूरी है कि हर वीवीआईपी मूवमेंट में सुरक्षा कारणों से कुछ समय के लिए यातायात नियंत्रित करना पड़ सकता है। चुनौती यह है कि ऐसे प्रतिबंध कितने समय तक रहें, उनका दायरा कितना हो और आम नागरिकों को होने वाली असुविधा को किस तरह कम किया जाए।
इसके लिए पहले से यातायात योजना तैयार करना, वैकल्पिक मार्गों की स्पष्ट जानकारी देना, प्रमुख चौराहों पर पर्याप्त पुलिसकर्मी तैनात करना, एंबुलेंस के लिए ग्रीन कॉरिडोर की व्यवस्था रखना और यातायात बहाल करने में अनावश्यक देरी से बचना जरूरी है।
सुरक्षा और नागरिक सुविधा को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करने के बजाय दोनों के बीच संतुलन बनाना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।
अब समय है प्रोटोकॉल के साथ जवाबदेही तय करने का
वीवीआईपी संस्कृति की पहचान इस बात से नहीं होनी चाहिए कि किसी के आने पर कितनी सड़कें खाली कराई गईं या कितने लोगों को इंतजार करना पड़ा। उसकी कसौटी यह होनी चाहिए कि सुरक्षा व्यवस्था कितनी प्रभावी रही और आम जनता को कम से कम परेशानी हुई।
जनप्रतिनिधि हों या प्रशासनिक अधिकारी, उन्हें यह समझना होगा कि जनता का विश्वास केवल बड़े आयोजनों और सुरक्षा व्यवस्थाओं से नहीं, बल्कि आम नागरिक की परेशानी के प्रति संवेदनशीलता से भी बनता है।
सड़क पर खड़ा आम आदमी भी इसी लोकतंत्र का हिस्सा है। उसकी मंजिल, उसका समय, उसकी मजबूरी और उसके अधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
इसलिए जरूरत किसी की सुरक्षा व्यवस्था खत्म करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें सुरक्षा भी सुनिश्चित हो और जनता की जिंदगी भी बेवजह न थमे।
क्योंकि लोकतंत्र में काफिला कुछ देर के लिए गुजरता है, लेकिन जनता को रोज उन्हीं रास्तों से गुजरना होता है। और जब सड़कें बार-बार बंद होती हैं, तो सवाल भी उठते हैं—उन सवालों का जवाब व्यवस्था को देना ही होगा।




