
- रिपोर्ट: प्राची सिंह
Mumbai: हिंदी सिनेमा में कुछ निर्देशक ऐसे रहे हैं, जिन्होंने बड़े पर्दे पर आम आदमी की छोटी-छोटी खुशियों, परेशानियों और रिश्तों को इतनी सहजता से पेश किया कि उनकी फिल्में दर्शकों के जीवन का हिस्सा बन गईं। ऋषिकेश मुखर्जी भी ऐसे ही फिल्मकार थे। उनकी फिल्मों में मध्यवर्गीय परिवार, पति-पत्नी के रिश्ते, दोस्ती, दफ्तर की जिंदगी और रोजमर्रा की परेशानियां बेहद संवेदनशील अंदाज में दिखाई देती थीं।
ऋषिकेश मुखर्जी ने करीब 50 फिल्मों का निर्देशन किया। ‘आनंद’, ‘सत्यकाम’, ‘बावर्ची’, ‘अभिमान’, ‘चुपके चुपके’, ‘मिली’ और ‘गोल माल’ जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा के प्रमुख निर्देशकों में स्थापित किया। 30 सितंबर को उनकी जयंती के मौके पर आइए जानते हैं उनकी पांच चर्चित फिल्मों के बारे में।
सत्यकाम: ईमानदारी और आदर्शों की कहानी
1969 में रिलीज हुई ‘सत्यकाम’ में धर्मेंद्र ने सत्यप्रिय आचार्य का किरदार निभाया था। फिल्म एक ऐसे युवक की कहानी है, जो हर परिस्थिति में सच और ईमानदारी के रास्ते पर चलना चाहता है। हालांकि, जब उसका सामना वास्तविक दुनिया से होता है तो उसे पता चलता है कि समाज हमेशा उसके आदर्शों के मुताबिक नहीं चलता।
ऋषिकेश मुखर्जी इस कहानी से काफी प्रभावित थे। फिल्म के जरिए उन्होंने आदर्शवाद और सामाजिक वास्तविकताओं के बीच के टकराव को सामने रखा। ‘सत्यकाम’ को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ हिंदी फीचर फिल्म का सम्मान मिला था।
आनंद: जिंदगी को जीने का संदेश
1971 में आई ‘आनंद’ ऋषिकेश मुखर्जी की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल है। इसमें राजेश खन्ना ने आनंद सहगल और अमिताभ बच्चन ने डॉक्टर भास्कर का किरदार निभाया था।
फिल्म की कहानी ऐसे व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे पता है कि उसके पास जिंदगी का समय सीमित है। इसके बावजूद आनंद दुख में डूबने के बजाय हर पल को खुशी के साथ जीता है। दूसरी ओर डॉक्टर भास्कर जिंदगी और मौत को गंभीर नजरिए से देखते हैं। दोनों की दोस्ती डॉक्टर भास्कर के नजरिए में बदलाव लाती है।
फिल्म का संवाद ‘बाबू मोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं’ आज भी हिंदी सिनेमा के यादगार संवादों में गिना जाता है। फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के साथ फिल्मफेयर में भी कई सम्मान मिले।
बावर्ची: परिवार को जोड़ने वाली कहानी
1972 में रिलीज हुई ‘बावर्ची’ में राजेश खन्ना ने रघु का किरदार निभाया था। रघु एक ऐसे परिवार में बावर्ची बनकर आता है, जहां छोटी-छोटी बातों को लेकर परिवार के सदस्य आपस में उलझते रहते हैं।
घर के काम, खाना बनाने और रोजमर्रा की जिम्मेदारियों को लेकर चलने वाली खींचतान के बीच रघु अपने व्यवहार से परिवार के सदस्यों के बीच बदलाव लाने की कोशिश करता है। फिल्म में जया भादुड़ी, असरानी, ए.के. हंगल और दुर्गा खोटे जैसे कलाकार भी नजर आए।
ऋषिकेश मुखर्जी ने फिल्म के जरिए परिवार में आपसी सहयोग, प्रेम और साथ रहने की अहमियत को सरल अंदाज में पेश किया।
अभिमान: सफलता के बीच रिश्तों की परीक्षा
1973 में आई ‘अभिमान’ में अमिताभ बच्चन और जया बच्चन ने पति-पत्नी की भूमिका निभाई। फिल्म की कहानी गायक सुबीर और उमा के रिश्ते के इर्द-गिर्द घूमती है।
सुबीर शुरुआत में उमा की गायकी को प्रोत्साहित करता है। लेकिन जब उमा की लोकप्रियता उससे अधिक होने लगती है तो सुबीर के भीतर असुरक्षा और अहंकार की भावना पैदा होने लगती है। इसका असर उनके वैवाहिक रिश्ते पर पड़ता है।
फिल्म ने पति-पत्नी के रिश्ते में सफलता, बराबरी और अहंकार से पैदा होने वाली जटिलताओं को बेहद सहज तरीके से दिखाया। अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, बिंदू और असरानी जैसे कलाकारों ने इसमें अहम भूमिकाएं निभाईं।
मिली: मुश्किल हालात में भी जिंदगी से प्यार
1975 में आई ‘मिली’ में जया बच्चन ने मुख्य भूमिका निभाई थी, जबकि अमिताभ बच्चन भी फिल्म का हिस्सा थे। फिल्म की कहानी मिली नाम की एक खुशमिजाज लड़की की है, जो गंभीर बीमारी से जूझ रही है।
अपनी जिंदगी की मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद मिली अपने आसपास के लोगों के जीवन में खुशियां बांटती है। फिल्म में बीमारी, प्यार, उम्मीद और भावनाओं को बेहद सहज तरीके से पेश किया गया।
ऋषिकेश मुखर्जी के सिनेमा की खासियत यही थी कि उन्होंने बड़े मुद्दों को भी आम जिंदगी के छोटे-छोटे अनुभवों के जरिए दर्शकों तक पहुंचाया। यही वजह है कि उनकी कई फिल्में दशकों बाद भी दर्शकों के बीच अपनी जगह बनाए हुए हैं।




