
- वाराणसी मंडल ब्यूरो पंकज झा
Varanasi: रामनगर काशी राज परिवार की बहुमूल्य संपत्तियों को लेकर एक बार फिर विवाद गहराता दिखाई दे रहा है। काशी राज परिवार की महाराज कुमारी कृष्ण प्रिया ने कथित तौर पर सोशल मीडिया और विभिन्न माध्यमों में प्रसारित हो रही उन खबरों पर कड़ा एतराज जताया है, जिनमें दावा किया जा रहा है कि कुतलूपुर की भूमि पर कुंवर अनंत नारायण सिंह का नाम दर्ज हो गया है तथा रामनगर स्टेट की संपत्तियों को लेकर महाराज कुमारियों के दावे को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया है।
महाराज कुमारी कृष्ण प्रिया ने इन दावों को भ्रामक और जनता को भ्रमित करने वाला बताते हुए आरोप लगाया कि ऐसी खबरों के पीछे काशी की ऐतिहासिक धरोहर और राज परिवार की संपत्तियों पर नजर रखने वाले कथित भू-माफिया तत्व सक्रिय हो सकते हैं। उन्होंने जनता से अपील की कि केवल प्रचारित खबरों अथवा राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज होने को अंतिम स्वामित्व का प्रमाण मानकर किसी संपत्ति के क्रय-विक्रय में जल्दबाजी न करें।
‘चारों हकदारों के बराबर हिस्से का न्यायिक आदेश—फिर एक व्यक्ति को एकमात्र वारिस बताने की कोशिश क्यों?’
कृष्ण प्रिया ने वाराणसी के दशम अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश के समक्ष एलएआर संख्या 40/2014, विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी वाराणसी बनाम महाराज अनंत नारायण सिंह मामले में पारित निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि आदेश के पैरा 18 में उपलब्ध साक्ष्यों एवं परिस्थितियों के आधार पर महाराज अनंत नारायण सिंह तथा प्रति-आपत्तिकर्ताओं महाराज कुमारी विष्णु प्रिया, हरि प्रिया और कृष्ण प्रिया का प्रश्नगत संपत्ति में बराबर-बराबर हिस्सा पाया गया था।
उनका कहना है कि इसी न्यायिक स्थिति के रहते केवल डॉक्टर अनंत नारायण सिंह को एकमात्र वारिस बताकर संपत्तियों के नामांतरण और उसके आधार पर आगे बिक्री की कोशिशों पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने भी Jitendra Singh बनाम State of Madhya Pradesh मामले में स्पष्ट किया है कि राजस्व अभिलेख में केवल म्यूटेशन/नामांतरण से किसी व्यक्ति का स्वामित्व स्वतः स्थापित नहीं होता; राजस्व प्रविष्टियां मुख्यतः राजस्व संबंधी उद्देश्यों के लिए होती हैं और वास्तविक शीर्षक का विवाद सक्षम न्यायालय द्वारा तय किया जाता है।
‘14 जुलाई के आदेश को गलत तरीके से पेश किया जा रहा’—कृष्ण प्रिया
महाराज कुमारी कृष्ण प्रिया ने 14 जुलाई 2026 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को लेकर प्रसारित हो रही खबरों पर भी सवाल उठाया। उनके अनुसार, आदेश में कुछ संपत्तियों के नंबरों से संबंधित अंतरिम निषेधाज्ञा के संदर्भ में स्थिति स्पष्ट की गई है, लेकिन इसे इस रूप में प्रचारित करना कि महाराज कुमारियों का पूरा दावा ही खारिज हो गया है, वास्तविक न्यायिक स्थिति का सही चित्रण नहीं है।
उन्होंने कहा कि संबंधित मुकदमे में अधिकारों का प्रश्न अभी न्यायिक विचाराधीन है और अंतिम स्थिति को केवल भ्रामक शीर्षकों अथवा अधूरी जानकारी के आधार पर नहीं समझा जाना चाहिए।
लंबित मुकदमे में संपत्ति की खरीद पर भी उठाए सवाल
कृष्ण प्रिया ने संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 52 यानी lis pendens के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि जिस संपत्ति के अधिकार से संबंधित मुकदमा लंबित हो, उसके हस्तांतरण से मुकदमे में शामिल पक्षों के अधिकार अंतिम न्यायिक निर्णय से प्रभावित हो सकते हैं। धारा 52 का मूल सिद्धांत भी यही है कि लंबित मुकदमे के दौरान संबंधित अचल संपत्ति का ऐसा हस्तांतरण नहीं किया जा सकता जिससे न्यायालय के भावी आदेश के तहत दूसरे पक्ष के अधिकार प्रभावित हों, सिवाय न्यायालय की अनुमति और उसकी शर्तों के।
उन्होंने संभावित खरीदारों से अपील करते हुए कहा कि “काशी राज परिवार से संबंधित किसी भी संपत्ति के क्रय-विक्रय से पहले उसके मुकदमों, न्यायालयी आदेशों, राजस्व अभिलेखों और वास्तविक अधिकारों की स्वतंत्र कानूनी जांच अवश्य कराएं।”
‘नाम चढ़ना स्वामित्व की गारंटी नहीं’—सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
महाराज कुमारी ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में किसी व्यक्ति का नाम दर्ज हो जाना अपने आप में स्वामित्व का अंतिम प्रमाण नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का Jitendra Singh निर्णय इसी स्थापित सिद्धांत को दोहराता है कि म्यूटेशन प्रविष्टि से अधिकार, स्वामित्व या हित स्वतः पैदा नहीं होता।
‘काशी की विरासत को सस्ते सौदों में बदलने की कोशिश बर्दाश्त नहीं’
महाराज कुमारी कृष्ण प्रिया ने आरोप लगाया कि काशी राज परिवार की ऐतिहासिक संपत्तियों को लेकर बार-बार ऐसी खबरें सामने आना, जिनसे जनता को यह संदेश जाए कि संपत्तियां पूरी तरह विवादमुक्त हैं, गंभीर चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति केवल अखबार, सोशल मीडिया पोस्ट, राजस्व प्रविष्टि अथवा किसी पक्ष द्वारा किए गए दावे के आधार पर संपत्ति खरीदता है और बाद में उस संपत्ति पर मुकदमा सामने आता है, तो उसकी जीवनभर की कमाई जोखिम में पड़ सकती है।
उन्होंने जनता को चेतावनी देते हुए कहा—
“काशी राज परिवार की किसी भी संपत्ति के संबंध में आकर्षक सौदों, जल्दबाजी में बिक्री और एकतरफा दावों से सावधान रहें। पहले अदालत के रिकॉर्ड और संपत्ति के वास्तविक कानूनी अधिकारों की जांच करें, उसके बाद ही कोई निर्णय लें।”
परिवार में फूट डालने की कोशिश का भी आरोप
कृष्ण प्रिया ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ लोग निजी स्वार्थ के लिए काशी राज परिवार के सदस्यों के बीच विवाद और अविश्वास पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि काशी की ऐतिहासिक विरासत केवल जमीन-जायदाद का विषय नहीं, बल्कि उससे जुड़ी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अस्मिता का भी प्रश्न है।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राज परिवार की संपत्तियों को लेकर किसी भी प





