
प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार और अवैध निर्माण से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान भ्रष्टाचार पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह समाज में सामान्य होता जा रहा है। अदालत ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगाना चाहती है, तो भ्रष्टाचार निरोधक कानून में संशोधन कर गंभीर मामलों में मृत्युदंड जैसे कड़े दंड के प्रावधान पर विचार किया जा सकता है।
भ्रष्ट अधिकारियों और अवैध निर्माण पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थनंद की खंडपीठ हमीरपुर निवासी कैफुद्दीन समेत अन्य याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाओं में अवैध निर्माण के खिलाफ प्रस्तावित ध्वस्तीकरण (बुलडोजर) कार्रवाई से संरक्षण की मांग की गई थी।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि नगर निकायों और विकास प्राधिकरणों के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से अवैध निर्माण खड़े हो जाते हैं। रिश्वत लेकर नियमों की अनदेखी की जाती है और बाद में कार्रवाई होने पर सबसे अधिक नुकसान उन लोगों को उठाना पड़ता है जिन्होंने मकान खरीद लिया होता है। अदालत ने कहा कि अवैध निर्माण कराने वाले बिल्डरों के साथ-साथ उन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
राम मंदिर चढ़ावा चोरी का किया उल्लेख
अपने फैसले में अदालत ने राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी के मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि इस तरह की घटनाएं समाज के लिए चिंता का विषय हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि ऐसे मामलों से भी समाज में भ्रष्टाचार के प्रति संवेदनशीलता नहीं बढ़ती, तो यह गंभीर स्थिति को दर्शाता है।
खंडपीठ ने अपने निर्णय में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की 2025 की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया और भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कानूनी उपायों की आवश्यकता पर जोर दिया। अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि सरकार भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 में संशोधन कर गंभीर मामलों में कड़े दंड के प्रावधान पर विचार कर सकती है।
बुलडोजर कार्रवाई पर दिए महत्वपूर्ण निर्देश
अवैध निर्माण पर कार्रवाई को लेकर अदालत ने कहा कि किसी आरोपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद उसके मकान को ध्वस्त करने जैसी कार्रवाई में उचित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। फैसले में यह भी कहा गया कि यदि कोई व्यक्ति किसी मकान में तीन वर्ष या उससे अधिक समय से रह रहा है, तो ध्वस्तीकरण से पहले उसे पर्याप्त नोटिस और वैकल्पिक व्यवस्था का अवसर दिया जाना चाहिए।
हालांकि, इस मुद्दे पर जस्टिस सिद्धार्थनंद ने अलग राय व्यक्त की। उनका कहना था कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट किसी निश्चित समय-सीमा, जैसे दो वर्ष, को अनिवार्य रूप से निर्धारित नहीं कर सकता, क्योंकि इससे भविष्य में कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग की संभावना उत्पन्न हो सकती है।




