
- रिपोर्ट: स्निग्धा श्रीवास्तव
नई दिल्ली : Supreme Court of India ने दहेज हत्या के एक मामले में आरोपी पति को आजीवन कारावास की सजा सुनाते हुए समाज के सामने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अदालत ने कहा कि बेटियों की शादी बचाने की चिंता और सामाजिक बदनामी का डर कई बार महिलाओं को मौत के मुंह तक पहुंचा देता है।
जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने फैसले की शुरुआत में पूछा, “क्या युवा सोमा आचार्य की जान बचाई जा सकती थी? क्या सामाजिक बदनामी के डर ने उसे भेड़ियों के हवाले कर दिया?”
अदालत ने पाया कि सोमा आचार्य ने कई बार अपने माता-पिता को ससुराल में हो रही प्रताड़ना की जानकारी दी थी। इसके बावजूद परिवार और गांव के बुजुर्ग हर बार समझौते की कोशिश करते रहे और उसे वापस ससुराल भेजते रहे।
कोर्ट ने कहा कि सोमा ने कई बार मदद की गुहार लगाई और कुछ समय तक मायके में भी रही, लेकिन हर बार वैवाहिक संबंध बनाए रखने और मामला शांत कराने पर जोर दिया गया। अदालत ने इसे समाज के लिए “आंखें खोलने वाला मामला” बताया।
फैसले में कहा गया कि गांव के बुजुर्ग भी कथित समझौतों की प्रक्रिया में शामिल थे और परिवार को उम्मीद थी कि हालात सुधर जाएंगे, लेकिन अंततः सोमा की ससुराल में दर्दनाक मौत हो गई।
शादी के करीब 15 महीने बाद सोमा का शव फंदे से लटका मिला था। आरोपी पति ने इसे आत्महत्या बताया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल और अन्य साक्ष्यों के आधार पर इस दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि सबूत स्पष्ट रूप से दहेज उत्पीड़न से जुड़ी हत्या की ओर इशारा करते हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि सोमा को मोटरसाइकिल, टीवी और अन्य सामान की मांग को लेकर लगातार प्रताड़ित किया जाता था। उसके माता-पिता ने कुछ मांगें पूरी भी की थीं।
बेंच के अनुसार मृतका के शरीर पर मिले जख्म सामान्य फांसी के मामलों से मेल नहीं खाते। मेडिकल साक्ष्यों से साफ है कि मौत से पहले उसके साथ हिंसा हुई थी और यह मामला “नकली फांसी” का प्रतीत होता है।




