
- जन जन की आवाज पंकज झां की कलम से✍️
वाराणसी। विकास के दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई कितनी गहरी है, इसका जीता-जागता उदाहरण चौबेपुर थाना क्षेत्र के चिरईगांव ब्लॉक का बरियासनपुर गांव बन चुका है। आज़ादी के 78 साल बाद भी यह गांव बुनियादी सुविधा—सड़क पर रोशनी—के लिए तरस रहा है। हैरानी की बात यह है कि जिस मार्ग पर रोज़ाना सैकड़ों लोग गुजरते हैं, वहीं पर चिरईगांव पुलिस चौकी, एक इंग्लिश मीडियम स्कूल, प्राइमरी विद्यालय और सरकारी पशु चिकित्सा केंद्र जैसे महत्वपूर्ण संस्थान मौजूद हैं। इसके बावजूद पूरी सड़क अंधेरे में डूबी रहती है। शाम ढलते ही यह इलाका डर, असुरक्षा और अनदेखी का प्रतीक बन जाता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार शिकायतें की गईं, आवाज़ उठाई गई, लेकिन न तो प्रशासन की नींद टूटी और न ही जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी जागी। सबसे बड़ा सवाल गांव के प्रधान पर खड़ा होता है—आखिर गांव का प्रधान कर क्या रहा है? क्या विकास सिर्फ कागज़ों और बैठकों तक सीमित है? क्या गांव की सुरक्षा और बुनियादी जरूरतें उसकी प्राथमिकता में नहीं हैं? या फिर जनता की समस्याएं अब सुनने लायक भी नहीं रह गई हैं? यह कोई छोटी समस्या नहीं है—अंधेरे की वजह से दुर्घटनाओं का खतरा, महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा पर सवाल, और अपराध की संभावनाएं लगातार बनी रहती हैं। फिर भी जिम्मेदार लोग चुप हैं, मानो उन्हें इस अंधेरे से कोई फर्क ही नहीं पड़ता।
अब वक्त आ गया है कि बरियासनपुर के लोग अपनी आवाज़ बुलंद करें। प्रधान और प्रशासन को जवाब देना ही होगा। सड़क पर लाइट लगाना कोई एहसान नहीं, बल्कि उनका कर्तव्य है। अगर अब भी जिम्मेदार नहीं जागे, तो यह अंधेरा सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि व्यवस्था की सोच को भी उजागर करता रहेगा।




