
पटना: बिहार की राजनीति में इस समय एक असामान्य स्थिति देखने को मिल रही है, जहां राज्य में फिलहाल सिर्फ मुख्यमंत्री और दो डिप्टी मुख्यमंत्री ही सरकार चला रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के किसी भी सहयोगी दल के नेता ने अभी तक मंत्री पद की शपथ नहीं ली है, जबकि 243 सदस्यीय विधानसभा में अधिकतम 36 मंत्री बनाए जा सकते हैं।
सत्तारूढ़ गठबंधन के सूत्रों के अनुसार, कैबिनेट का विस्तार 4 मई के बाद किया जाएगा, जब जारी चुनावों के नतीजे सामने आ जाएंगे। यह बिहार में पहली बार है जब भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में सरकार बनी है और उसी के मुख्यमंत्री के नेतृत्व में कैबिनेट का गठन होना है।
कैबिनेट विस्तार में देरी के पीछे दिलचस्प वजह सामने आई है। एक वरिष्ठ एनडीए नेता के मुताबिक, भाजपा के अधिकांश सांसद, विधायक, विधान पार्षद और पदाधिकारी इन दिनों पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं। ऐसे में चुनाव खत्म होने और 4 मई तक परिणाम घोषित होने के बाद ही बिहार में मंत्रिमंडल का विस्तार किया जाएगा।
सूत्रों के अनुसार, संभावित कैबिनेट में करीब 70 प्रतिशत मंत्री नीतीश कुमार की पिछली टीम से ही बनाए रखे जा सकते हैं, जबकि शेष 30 प्रतिशत में नए चेहरों को अनुभव, जातीय समीकरण और क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए शामिल किया जाएगा।
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, जिन्होंने 15 अप्रैल को पदभार संभाला, इस समय अकेले 29 विभागों की जिम्मेदारी देख रहे हैं, जिनमें गृह मंत्रालय भी शामिल है। इससे पहले वह नीतीश कुमार सरकार में डिप्टी मुख्यमंत्री रहते हुए भी गृह विभाग संभाल चुके हैं।
वहीं, जनता दल (यूनाइटेड) के दो डिप्टी मुख्यमंत्री अन्य विभागों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। डिप्टी सीएम विजय चौधरी जल संसाधन, संसदीय कार्य, शिक्षा और ग्रामीण विकास विभाग देख रहे हैं, जबकि दूसरे डिप्टी सीएम बिजेंद्र यादव वित्त, ऊर्जा, समाज कल्याण, योजना और विकास विभागों का संचालन कर रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, कैबिनेट विस्तार के बाद ही सरकार पूरी तरह से सक्रिय और संतुलित रूप में काम कर पाएगी। फिलहाल, सीमित मंत्रिमंडल के साथ प्रशासन चलाना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।



