
नई दिल्ली: लोकसभा में महिला आरक्षण बिल (131वां संविधान संशोधन) पर हुई अहम वोटिंग में सरकार को बड़ा झटका लगा है। बिल के पक्ष में 326 वोटों की आवश्यकता थी, लेकिन केवल 298 सांसदों ने समर्थन किया, जबकि 230 वोट इसके विरोध में पड़े। इसके साथ ही विशेष सत्र का मुख्य उद्देश्य अधूरा रह गया और महिला आरक्षण लागू होने की समय-सीमा आगे खिसकती नजर आ रही है।
इससे पहले परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई थी, लेकिन उसे भी पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका। महिला आरक्षण बिल के पारित न होने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार आगे क्या रणनीति अपनाएगी, क्योंकि यह एक संविधान संशोधन से जुड़ा मामला है, जिसके लिए विशेष बहुमत जरूरी होता है।
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, अनुच्छेद 368 के तहत ऐसे संशोधन बिल को संयुक्त सत्र में पारित नहीं कराया जा सकता। इसके लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में अलग-अलग विशेष बहुमत हासिल करना अनिवार्य है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि महिला आरक्षण लागू होने में अब देरी तय है।
साल 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम के मुताबिक यह कानून परिसीमन और जनगणना की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही लागू होगा। मौजूदा हालात को देखते हुए इसके 2029 की बजाय 2034 या उससे आगे लागू होने की संभावना जताई जा रही है।
सरकार के सामने अब कई विकल्प मौजूद हैं—बिल को दोबारा लोकसभा में पेश करना, विपक्ष की आपत्तियों के अनुसार संशोधन करना, राज्यसभा में समर्थन जुटाना या विपक्षी दलों से सहमति बनाना। इसके अलावा सीमित बदलाव के साथ नया संशोधन लाने का रास्ता भी खुला है।
हालांकि, यदि राजनीतिक सहमति नहीं बनती है, तो 2029 का लोकसभा चुनाव मौजूदा 543 सीटों पर ही होगा और महिला आरक्षण लागू नहीं हो पाएगा। जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ संसदीय प्रक्रिया का मुद्दा नहीं, बल्कि देश में महिला सशक्तिकरण और राजनीतिक भागीदारी से जुड़ा एक अहम विषय है, जिस पर व्यापक सहमति जरूरी होगी।



