- रिपोर्ट: पंकज झा
वाराणसी। काशी की समृद्ध सांगीतिक परंपरा एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्वर में गूंज उठी, जब रूस के सितार वादक स्टेपन सितार और वाराणसी के प्रख्यात तबला वादक कुशल कृष्ण ने मंच साझा कर शास्त्रीय संगीत प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम में राग झिझोटी की मनमोहक प्रस्तुति और तीनताल की जटिल लयकारी ने श्रोताओं को देर तक बांधे रखा।
कार्यक्रम का आरंभ स्टेपन सितार द्वारा आलाप से हुआ, जिसमें उन्होंने धीरे-धीरे राग के स्वरूप को विस्तार देते हुए उसकी गहराई और भाव पक्ष को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति में भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रति उनकी गहन साधना और समर्पण स्पष्ट झलक रहा था। आगे बढ़ते हुए उन्होंने मध्यम और द्रुत लय में गतों के माध्यम से राग की सुंदरता को और निखारा।
तबला पर संगत करते हुए कुशल कृष्ण ने तीनताल में अपनी उत्कृष्ट लयकारी का प्रदर्शन किया। उनकी सधी हुई थाप, बोलों की स्पष्टता और तिहाइयों की सटीकता ने प्रस्तुति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। सितार और तबले के बीच संवादात्मक शैली में हुई जुगलबंदी ने श्रोताओं को रोमांचित कर दिया।
विशेष रूप से द्रुत लय में प्रस्तुत गत और उसके बाद तबले की पेशकार, कायदा और रेला ने कार्यक्रम को चरम पर पहुंचा दिया। हर मनभावन बंदिश और लयकारी पर श्रोताओं ने तालियों की गूंज से कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।
इस अवसर पर उपस्थित संगीत प्रेमियों ने इसे भारतीय शास्त्रीय संगीत की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रतीक बताया। एक ओर जहां रूस के कलाकार ने भारतीय राग की आत्मा को जीवंत किया, वहीं बनारस के तबला वादक ने अपनी परंपरा की गहराई को प्रभावी रूप में प्रस्तुत किया।



