
- वरिष्ठ संवाददाता: राजीव आनन्द
लखनऊ: 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत में पहले से पराजित जापान के दो बड़े शहरों हिरोशिमा (6 अगस्त) तथा नागासाकी (9 अगस्त) पर नए उभरते हुए महाशक्ति अमरीकी साम्राज्यवाद द्वारा, गिराए गए परमाणु बमों की याद विश्व की जनता के दिलो दिमाग में अमिट रूप से समा गई है। वह परमाणु हथियारों की अथाह दुष्परिणामों को आज भी नहीं भुला पा रही है।
ऐसी परिस्थिति में जबर्दस्त भूकम्प और सुनामी की लहरों से 11 मार्च 2011 को जापान के फुकुशिमा में परमाणु ऊर्जा के इतिहास में सबसे बड़ी नाभिकीय तबाही मची थी। इसकी वजह से हुई दुर्घटना पर आज भी काबू नहीं पाया जा सका है। इससे सघन आबादी वाले जापान द्वीप का एक बड़ा इलाका लोगों की बसाहट लायक नहीं रह गया। हवा और समुद्र के जरिए फैले रेडियोधर्मी विकिरण ने पूरी दुनिया में मनुष्य के खाद्य चक्र को दुषित कर दिया है और यह आने वाले कई दशकों तक भयंकर बीमारियों को भी जन्म देता रहेगा।
तभी से परमाणु ऊर्जा के उपयोग के खिलाफ दुनिया भर में प्रतिरोध विकसित हो रहा है। यह ज्यादा से ज्यादा देशों में फैलता जा रहा है और इसने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी की सम्पूर्ण ऊर्जा नीति के संकट को उजागर कर दिया है।
1979 में अमेरिका के हैरिसबर्ग के निकट थ्री माइल आईलैण्ड और 1986 में उक्रेन के चेर्नोबील की दुर्घटना, और साथ ही भारी जोखिमों से भरी अन्य अनेक दुर्घटनाओं ने साफ तौर पर साबित कर दिया है कि मौजूद तकनीक के संदर्भ में परमाणु ऊर्जा के उत्पादन को नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। बाढ़, भूकम्प, भीतरी तोड़फोड़ और हवाई जहाजों की टक्कर जैसी बाहरी कारणों के अलावा भी यह त्रुटियों और गलतियों के प्रति अतिसंवेदनशील है। मनुष्य द्वारा संचालित किसी भी अन्य तकनीकी के समान इसमें टूट-फूट और क्षरण होता रहता है तथा निर्माण और संचालन के समय गलतियों से बचा नहीं जा सकता है। परमाणु ऊर्जा के संबंध में इसके सम्भावित दुष्परिणामों को किसी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता और यह व्यापक जनता के स्वास्थ्य एवं जिंदगी के लिए खतरनाक है।
परमाणु बिजलीघरों से निकलने वाला कचरा लम्बे समय तक, दस लाख साल तक, रेडियोधर्मी विकिरण फैलाता है, जिसे मनुष्य द्वारा काबू नहीं किया जा सकता है। परमाणु तकनीकी के विकास के अस्सी साल बाद भी दुनिया में किसी भी स्थान पर बिना खतरे के रेडियोधर्मी कचरे के भण्डारण और उसे अंतिम रूप से ठिकाने लगाने का कोई स्वीकृत तरीका नहीं है। यूरेनियम खनन, परमाणु बिजलीघरों एवं परमाणु शोध संयंत्रों के निर्माण के कारण पहले ही पर्यावरण को भारी नुकसान हो चुका है और ऊर्जा की अस्वीकार्य बर्बादी हो चुकी है।
कई देशों में परमाणु बिजलीघरों का निर्माण परमाणु हथियारों के उत्पादन के लिए समृद्ध यूरेनियम की आपूर्ति के लिए किया जाता है। यह दावा करना कि इस तरह के ऊर्जा का उत्पादन कम खर्चीला है, लम्बे समय से फैलाया जा रहा भ्रम है। एक परमाणु बिजलीघर के निर्माण की लागत चार से सात बिलियन अमेरिकी डालर है। अन्य किसी किस्म की ऊर्जा को राज्य द्वारा इतना ज्यादा अनुदान नहीं दिया जाता है। इसी कारण से ऊर्जा उत्पादक कंपनियों को अधिकतम मुनाफा होता है।
यह दावा करना कि परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण और संचालन से एशिया ,अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के उन नव-उपनिवेशिक रूप से आश्रित देशों की राष्ट्रीय संप्रभुता की गारंटी होगी जहां कच्चे माल का अभाव है, लम्बे समय से फैलाया जा रहा भ्रम है। किसी भी अन्य क्षेत्र से ज्यादा, परमाणु ऊर्जा उत्पादन की तकनीकी पर केवल गिने-चुने अन्तरराष्ट्रीय ऊर्जा इजारेदारों और संयंत्र निर्माताओं का नियंत्रण है, जैसे कि सीमन्स, तोशिबा, वेस्टिंगहाउस, जनरल इलेक्ट्रिक, रोसाटोम और अवेरा। वे कभी भी अपनी तकनीकी जानकारी को अपने हाथ से निकलने नहीं देंगे। इसके अलावा, जन समुदाय को खतरे में डालकर घातक तकनीकी की मदद से राष्ट्रीय सम्प्रभुता कभी भी एक स्वतंत्र रास्ता नहीं हो सकता है, बल्कि एक गलत रास्ता है।
फुकुशिमा दुर्घटना के बाद यह निर्विवाद है कि इस किस्म का ऊर्जा उत्पादन एकदम से अमानवीय है। जन प्रतिरोध की वैश्विक लहर के जरिए एक देश की सरकार को इस राजनीति से बाज आने के लिए बाध्य किया गया है। जर्मनी में 17 परमाणु बिजलीघरों को तत्काल बन्द कर दिया गया । इटली में एक जनमत संग्रह में फिर से परमाणु बिजलीघरों के निर्माण को खारिज कर दिया गया । वेनेजुएला में, चिली में और स्विटजरलैण्ड में परमाणु ऊर्जा संयत्रों का निर्माण रद्द कर दिया गया । जापान में 82 प्रतिशत लोगों ने आगे से परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल पर आपत्ति जतायी है।
चेरनोबिल परमाणु संयत्र दुर्घटना को इस साल 38 साल पूरे हो गए हैं। परमाणु ऊर्जा उद्योग तथा इसके समर्थक इस दुर्घटना को भुलाकर परमाणु ऊर्जा को नयी ऊँचाईयों तक पहुंचाने का दावा कर रहे थे। मगर चेरनोबिल परमाणु दुर्घटना की 25 वीं बरसी के कुछ दिन पहले ही जापान के फुकुशिमा में दाईः ची परमाणु ऊर्जा संयंत्र की खौफनाक तबाही ने पूरे विश्व को स्तब्घ कर दिया था। फुकुशिमा की तबाही ने यह बिल्कुल साफ तथा स्पष्ट कर दिया है कि ‘‘सुरक्षित परमाणु रिएक्टर‘‘ का दावा सिर्फ एक ढकोसला है और इस दावे को कभी भी जमीनी सच्चाई में नहीं बदला जा सकता। फुकुशिमा की इस तबाही के बाद फिर से परमाणु ऊर्जा तकनीक के सुरक्षित होने के गीत गाने शुरू कर दिये गए। जापान में आयी इस महाविपदा के कारण जर्मनी ने ईमानदारी से इस खतरनाक तकनीक के भविष्य पर दुबारा से सोचा तथा अपने सभी 30 साल पुराने रियक्टरों को बंद करने का निर्णय लिया था। मगर वहीं भारत बहुत ही बेशर्मी तथा अदूरदर्शिता दिखाते हुए अपने परमाणु कार्यक्रम को और विस्तृत करने में लग गया। भारत के महाराष्ट्र राज्य के जैतापुर में विश्व का सबसे बड़ा ‘परमाणु ऊर्जा पार्क‘ स्थापित करने की योजना के खिलाफ जनपक्षीय संगठनों ने मिलकर आंदोलन किया। तमिलनाडु के कुडनकलम परमाणु संयंत्र के खिलाफ भी जबरदस्त संघर्ष चला।
भारत इस समय अपनी परमाणु नीति के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। दुनिया के साम्राज्यवादी ताकतों का सरगना अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शुल्क युद्ध के दबाव में भारत की फासिस्ट मोदी सरकार जो साम्राज्यवाद की जूनियर पार्टनर है ,के द्वारा दो महत्वपूर्ण क़ानूनों—1962 का “परमाणु ऊर्जा अधिनियम” और 2010 का “नाभिकीय क्षति के लिए नागरिक उत्तरदायित्व अधिनियम (CLNDA)”—में संशोधन का ज़ोरदार प्रयास चल रहा है। इसका उद्देश्य विदेशी निवेश को आकर्षित करना और ऊर्जा तथा जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के लिए देश की परमाणु ऊर्जा क्षमता को बढ़ाना है। लेकिन ये प्रस्तावित बदलाव आम भारतीयों के हित में नहीं हैं।
NAAM (नेशनल अलायंस ऑफ एंटी-न्यूक्लियर मूवमेंट्स), फेपाड और देशभर के जागरूक नागरिकों ने चेतावनी दी है कि ये संशोधन साम्राज्यवादी सरकारों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में लाए जा रहे हैं, जो भारत को परमाणु रिएक्टर और तकनीक बेचना तो चाहती हैं, लेकिन अगर कोई दुर्घटना या गड़बड़ी होती है तो उसके लिए जिम्मेदारी नहीं लेना चाहतीं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन संशोधनों का मकसद आपूर्तिकर्ताओं—खासकर विदेशी अमरीकन और यूरोपियन कंपनियों—की जिम्मेदारी को या तो पूरी तरह से हटा देना है या कमजोर करना है। यदि ऐसा हुआ तो किसी परमाणु दुर्घटना की स्थिति में भारतीय करदाताओं और आम जनता को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी, जबकि असली जिम्मेदार कंपनियाँ बिना किसी सजा के बच निकलेंगी। जब आपूर्तिकर्ताओं की कानूनी जवाबदेही कमजोर की जाती है, तो सुरक्षा और जवाबदेही का प्रोत्साहन भी कम हो जाता है। ऐसे में इन संयंत्रों के आसपास रहने वाले समुदाय और पर्यावरण को अधिक खतरा होगा।
और भी बुरा यह है कि इस बदलाव से भारत का विदेशी तकनीक और कंपनियों पर निर्भरता बढ़ेगी, जिससे देश की अपनी विशेषज्ञता, अनुसंधान और निर्माण क्षमता को नुकसान होगा। यह आत्मनिर्भर भारत के विचार के बिल्कुल विपरीत है। और यह सब बिना किसी सार्वजनिक चर्चा, वैज्ञानिक विशेषज्ञों की सलाह या उन लोगों की राय लिए हो रहा है, जो इन परमाणु संयंत्रों के आसपास रहते हैं और जिनकी ज़िंदगियाँ सबसे ज़्यादा खतरे में हैं।
भारत के भविष्य के लिए यह ज़रूरी है कि हमारे कानून जनता और देश की मिट्टी के हितों की रक्षा करें, न कि केवल कंपनियों के मुनाफे या अंतरराष्ट्रीय सौदों की। इस तरह के संवेदनशील कानूनों में कोई भी बदलाव गंभीर वैज्ञानिक परीक्षण और लोकतांत्रिक बहस के बिना नहीं होना चाहिए।
पिछले 11 साल से भी अधिक समय से देश की सत्ता पर काबिज़ संघी मनुवादी फासीवादी ताकतों ने अमरीकी और यूरोपियन साम्राज्यवादी ताकतों के दबाव में सस्ते ,सुरक्षित प्राकृतिक ऊर्जा के विकल्प तलाशने की जगह विनाशकारी परमाणु ऊर्जा को ईंधन का प्रमुख स्रोत मानते हुए देश के विभिन्न स्थानों मसलन आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में नए परमाणु बिजलीघरों के निर्माण का प्रस्ताव रखा है।
म.प्र. के मंडला जिले के चुटका में प्रस्तावित परमाणु सयंत्र परियोजना के खिलाफ जबरदस्त जन आंदोलन के चलते दो बार सरकार को वहां जन सुनवाई स्थगित करनी पड़ी। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में यूरेनियम के नये खदान खोलने की योजना है। जहां भी संयत्र लगाने का प्रस्ताव है, वहां के किसान और जनता इसके खिलाफ विद्रोह कर रही है और अपने विस्थापन का विरोध कर रही है। जैतापुर में परमाणु ऊर्जा पार्क का विरोध करने पर स्थानीय संघर्षरत जनता पर लाठियां तथा गोलियां बरसाई गई जिसमें बहुत से लोग घायल हुए थे तथा एक को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था । हमारी सरकार तथा प्रधानमंत्री परमाणु ऊर्जा से पैदा होने वाली बिजली की रोशनी में अंधे से हो गये हैं। मौजूदा संघी मनुवादी फासिस्ट सरकार धुर दक्षिणपंथी है और जबरदस्त रूप से अमरीकी परस्त है ।ये सरकार, परमाणु ऊर्जा और परमाणु हथियारो की जबरदस्त वकालत अपने साम्राज्यवादी आकाओं के हित में कर रही है।
सुरक्षित परमाणु ऊर्जा एक मिथक है।
परमाणु ऊर्जा संयत्रों की दुर्घटनाओं के इतिहास की तीन सबसे भीषण दुर्घटनायें ऐसे तीन देशों में हुई हैं जिनका दर्जा महाशक्ति देश का रहा है। उदाहरण के लिए पूर्व सोवियत संघ (रूस), जो उस वक्त एक महाशक्ति था, अमेरिका जो अभी भी महाशक्ति होने का दावा करता है, जापान, जो तकनीकी रूप से सर्वश्रेष्ठ रहा है तथा जिसे अपने उपकरणों पर हमेशा नाज रहा है। हेरिसबर्ग, चेरनोबिल, फुकुशिमा इन तीनों जगह पर हुई तबाहियों ने यह साबित कर दिया है कि एक बार जब यह जिन्न अपनी बोतल से बाहर आ जाता है तो इसे काबू में करना बहुत मुश्किल होता है, भले ही आप महाशक्ति हों या दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हों। इन तीनों दुर्घटनाओं को याद करना जरूरी है, क्योंकि ये इस मिथक का पुरजोर खंडन करती हैं कि परमाणु ऊर्जा मानवता के लिए सुरक्षित है।
व्यापक जन समुदायों के बीच जन जागरण के लिए व्यवस्थित ढंग से काम करके, सक्रिय प्रतिरोध का व्यापक गठबंधन बनाकर, आलोचनात्मक रूख रखने वाले वैज्ञानिकों को अपने पक्ष में लाकर, परिष्कृत जानकारी प्रदान करने के लिए कार्यक्रमों का आयोजन कर, संघर्ष, नाकेबन्दी और हड़तालों के साझे दिवस का पालन कर साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष में दुनिया के परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को बन्द करने तथा सभी नाभिकीय हथियारों पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी और मजदूर वर्गीय आंदोलन का एक केन्द्रीय कार्यभार बनाया जा सकता है।
विश्वव्यापी पर्यावरण विनाश से मानवजाति की आजीविका पर मंडरा रहे खतरे के विरूद्ध पूरी दुनिया में संघर्षरत जनता की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। प्राकृतिक वातावरण के संरक्षण के लिए,जलवायु परिवर्तन और वैश्विक उष्णता के खिलाफ संघर्ष सामाजिक और राष्ट्रीय मुक्ति के लिए तथा समाजवादी सामाजिक व्यवस्था के लिए संघर्ष का हिस्सा है, जो मानव जीवन का प्रकृति के अनुरूप उत्पादन और पुनरूत्पादन करेगा।
परमाणु ऊर्जा के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मुहिम निम्न नारों के साथ चलाया जाना चाहिए :-
- समस्त संसार में तत्काल सभी परमाणु बिजलीघरों और संयंत्रों को बन्द करने के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करो!
- कॉरपोरेट/ बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मुनाफे की लालच से पर्यावरण की रक्षा करो!
- संचालकों के खर्च पर दुनिया भर में सभी परमाणु बिजलीघरों को तत्काल ताला लगाओ!
- पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा का तत्काल विस्तार करो!
- सभी नाभिकीय, जैविक और रासायनिक हथियारों पर प्रतिबंध लगाओ और उन्हें खत्म करो!
- प्राकृतिक वातावरण की रक्षा के लिए सक्रिय प्रतिरोध के एक अंतराराष्ट्रीय मोर्चें का गठन करो।
- साम्राज्यवाद के विरूद्ध और समाजवादी समाज के लिए संघर्ष करो, जहां मानवजाति और प्रकृति की एकता को साकार किया जा सके!
आइए, हम सब मिलकर दुनियाभर में चलाए जा रहे इस मुहिम का समर्थन करें। कल कहीं बहुत देर न हो जाए।





