
- रिपोर्ट: अनुपम श्रीवास्तव
गोरखपुर: योगी जी के जनता दर्शन की बढ़ती भीड़ और प्रशासनिक तंत्र पर उठते सवालों पर मेरी कलम से जनता जनार्दन के दर्द को मुख्यमंत्री तक पहुंचाना ही इस लेखनी का मुख्य उद्देश्य है!
मुख्यमंत्री के जनता दर्शन में रोज़-रोज़ बढ़ती हुई भीड़ एक बड़ी सच्चाई को उजागर करती है—प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरियाँ और आम जनता की उपेक्षित समस्याएँ। जनता दरबार का मूल उद्देश्य है कि लोग सीधे मुख्यमंत्री तक अपनी बात रख सकें, लेकिन जब यह मंच रोज़-मर्रा का समाधान बन जाए, तो यह संकेत है कि नीचे की पूरी व्यवस्था उम्मीद के अनुसार काम नहीं कर रही है।
अधिकारियों की निष्क्रियता का परिणाम: बढ़ता जन-समूह
अगर जिला-स्तर से लेकर तहसील और थाने तक अधिकारी समय पर और ईमानदारी से कार्य करते, तो आम जनता को मुख्यमंत्री तक पहुँचने की आवश्यकता ही नहीं होती।
•फाइलों का पेंडिंग रहना,
•शिकायतों पर समय से कार्रवाई न होना।
•IGRS पर गलत रिपोर्ट लगाना
•भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता,
अधिकारियों द्वारा लोगों की समस्याओं को गंभीरता से न लेना—ये कुछ ऐसे कारण हैं, जिनसे जनता का भरोसा स्थानीय प्रशासन पर कमजोर होता जा रहा है।
यही कारण है कि लोग सीधे मुख्यमंत्री के पास अपनी बात ले जाने को मजबूर हो जाते हैं।
जनतादर्शन राहत देने वाली पहल है, पर इसकी बढ़ती भीड़ यह बताती है कि यह राहत अब मजबूरी बन चुकी है।
सरकार जनता की समस्याएँ सुनने और त्वरित समाधान देने का प्रयास करती है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं बन सकता।
असली सुधार तभी संभव है जब:
1. जिला और तहसीली स्तर पर पारदर्शिता बढ़े,
2. अधिकारियों की जवाबदेही तय हो,
3. समयबद्ध शिकायत निस्तारण अनिवार्य हो,
4. प्रशासनिक ढांचे में सख्त अनुशासन लागू किया जाए।
व्यवस्था मजबूत होगी, तभी जनता दर्शन की आवश्यकता घटेगी..
जनतादर्शन की बढ़ती भीड़ बताती है कि जनता को आज भी अपने अधिकारों हेतु संघर्ष करना पड़ रहा है।
अगर अधिकारी अपने स्तर पर सक्रिय, संवेदनशील और जिम्मेदार हों, तो न जनता परेशान होगी और न ही मुख्यमंत्री को रोज़ाना इतने विशाल स्तर पर लोगों की सुनवाई करनी पड़ेगी।
मेरे हिसाब से जनता दर्शन एक पुल की तरह है, जो जनता और सरकार को सीधे जोड़ता है। लेकिन पुल तभी बनाया जाता है जब रास्ते कहीं टूट चुके हों।
जरूरत इस बात की है कि नीचे की व्यवस्था इतनी मजबूत हो कि जनता को मुख्यमंत्री तक पहुँचने की आवश्यकता ही न पड़े।
अधिकारियों को यह समझना होगा कि वे जनता की सेवा के लिए हैं—अगर वे अपने दायित्व ईमानदारी से निभाएँ, तो जनता दर्शन जैसी व्यवस्थाएँ अपवाद बनेंगी, नियम नहीं।


