
- रिपोर्ट: प्रतीक वार्ष्णेय
हाथरस। उत्तर प्रदेश सरकार बार-बार स्पष्ट निर्देश दे रही है कि “सम्बद्धिकरण (Attachment) किसी भी कीमत पर समाप्त किया जाए”, लेकिन हाथरस का प्रशासन जैसे इन आदेशों को सुनने के मूड में ही नहीं है। शासन की सख्ती यहाँ आते-आते बेअसर हो जाती है, और अटैचमेंट माफिया का दबदबा बेखौफ जारी है।
जिले में ऐसे कई कर्मचारी हैं जिन पर विजिलेंस जांच के गंभीर आरोप दर्ज हैं, मगर वही कर्मचारी सम्बद्धिकरण का कवच ओढ़कर आज भी मलाईदार कुर्सियों पर आराम से जमे हुए हैं।
सबसे बड़ा सवाल—जब शासन ने यह प्रथा खत्म करने को कहा है, तो हाथरस प्रशासन और BSA चुप क्यों हैं?
**इन नामों पर उठ रही सबसे बड़ी उंगलियाँ —
विपिन भारद्वाज, अजीत शर्मा और प्रमोद शर्मा** सूत्रों के मुताबिक, इन तीनों के खिलाफ विभागीय स्तर तक जांचें लंबित हैं, लेकिन इन्हें सम्बद्धिकरण के सहारे महत्वपूर्ण दफ्तरों में तैनाती मिली हुई है। विभाग के अंदरूनी लोगों का कहना है किसजातीय बाबू + भ्रष्टाचार का गठजोड़ इतना मजबूत है कि वर्तमान BSA भी इनके सामने बेबस नजर आती हैं।”
कहने वालों का तो यहाँ तक दावा है कि पूर्व BSA के समय भी इन्हीं बाबुओं को अटैचमेंट का संरक्षण मिला हुआ था, और आज भी हालात जस के तस हैं। मौजूदा BSA के पास कार्रवाई करने की शक्ति तो है, पर हिम्मत नहीं—ऐसा आरोप विभाग में आम चर्चा का विषय है।
क्या हाथरस की BSA सरकार से भी बड़ी हो गई हैं?


या फिर अटैचमेंट गैंग इतना प्रभावी है कि शासन के “VIP आदेश” भी उनके सामने फीके पड़ जाते हैं?


शिक्षा विभाग में कर्मचारियों की भारी कमी है, लेकिन जिन कर्मचारियों को ब्लॉकों और विद्यालयों में तैनात होना चाहिए, वे मुख्यालय और ऑफिस की आरामदायक कुर्सियों पर कब्जा जमाए हुए हैं। यह पूरा खेल निधियों के लेन-देन और पोस्टिंग-सेटिंग से जुड़ा बताया जा रहा है।
जब सीएम खुद कह चुके हैं कि सम्बद्धिकरण तुरंत खत्म किया जाए, फिर भी हाथरस में यह अवैध व्यवस्था धड़ल्ले से क्यों चल रही है?
कौन हैं वे अदृश्य हाथ जो विपिन भारद्वाज, अजीत शर्मा और प्रमोद शर्मा जैसे आरोपित कर्मचारियों को बचा रहे है
“हाथरस में शासन के आदेश फाइलों में दम तोड़ देते हैं, यहाँ राज तो सिर्फ अटैचमेंट माफिया का चलता है।”
अगर सरकार सच में “भ्रष्टाचार मुक्त शिक्षा विभाग” का सपना देख रही है, तो हाथरस का यह मामला प्रदेश स्तर पर हाई-लेवल जांच की मांग कर रहा है। क्योंकि जहाँ आरोपी ही दफ्तर चला रहे हों और अधिकारी चुप हों—वहाँ सवाल उठना स्वाभाविक है।





