
- रिपोर्ट: पंकज झा
वाराणसी। बच्चों को स्वस्थ रखने के लिए उचित आहार का प्रयोग करना अत्यंत आवश्यक है ।इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही/कमी/त्रुटि होने पर बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो सकती है जिससे बच्चे को संक्रमण जन्य बीमारइया हो जाती है। अतः बीमारियों से लड़ने की क्षमता का विकास करने के लिए आयुर्वेद में स्वर्णप्राशन का प्रयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया में बच्चों को शुद्ध स्वर्णभस्म , मधु और घृत का मिश्रण दिया जाता है।
स्वर्णप्राशन संस्कार से बच्चों में बिभिन्न रोंगों से लड़ने की क्षमता का विकास होता है। साथ ही साथ शारीरिक और मानसिक गति में भी सुधार होता है। आजकल के सापेक्ष्य में इसे आयुर्वेदिक टीकाकरण (प्रतिरक्षण) कहा जा सकता है । यह जन्म से लेकर रोग 16 साल तक के बच्चों को दिया जाता है।
स्वर्णप्राशन के लाभ :- आयुर्वेद में वर्णित इस संस्कार के कई लाभ है,जो आपके बच्चे को स्वस्थ बनाने के साथ साथ गुणकारी, ऊर्जावान व बलवान बनाने में मदद करते हैं।
1- बच्चे की रोगप्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है अर्थात शिशु बार बार सामान्य संक्रमण से बीमार नहीं पड़ता है ।
2- शारीरिक और मानसिक विकास में गति मिलती है, जिससे वह अपने उम्र के अन्य बालकों की तुलना में उसका विकास अच्छा होता है।
3- शास्त्रों में वर्णित गुणों के अनुसार 6 महीने तक लगातार सेवन करने से उसकी स्मरण शक्ति अत्यंत तेज हो जाती है।
4- आयुर्वेदिक चिकित्सक की देखरेख में प्रतिदिन सेवन करने से बच्चों की बुद्धि, बल, स्वास्थ्य और पाचन शक्ति में सुधार होता है।
5- शरीर में दूषित पदार्थों को बाहर निकाल कर त्वचा को बेहतर बनाता है अर्थात शरीर के वर्ण में गुणोत्तर वृद्धि होती है।
6- इसके सेवन से न केवल भूख कम लगना आदि समस्याओं अपितु पाचन संबंधी समस्त बीमारियों में सुधार मिलता है।
स्वर्णप्राशन के दौरान परहेज:- इस दौरान कोशिश यह करनी चाहिए कि बच्चो को तली भुनी हुई चीज़ें, मैदे इत्यादि से बने खाद्य पदार्थ और जंक फूड न दें।
अतः अपने बच्चों को किसी रजिस्टर्ड आयुर्वेदिक चिकित्सक की देख-रेख में ही स्वर्णप्राशन कराए। चिकित्सक द्वारा आपके बच्चे के स्वास्थ्य का परीक्षण कर सभी आवश्यक जानकारी जैसे लंबाई, वजन, खानपान संबंधित विवरण का रिकॉर्ड बनाकर ही यह औषधि पिलाई जाती है ।





