
- रिपोर्ट: अनुराग सिंह बिष्ट
हरिद्वार/रुड़की: 2013 की केदारनाथ आपदा में शिवम लापता हो गया था। कई दिनों की तलाश के बाद जब कोई सुराग नहीं मिला, तो परिवार ने मान लिया कि वह अब नहीं रहा। कागज़ी कार्रवाई हुई, प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार भी कर दिया गया। घर ने उसके बिना जीना सीख लिया।
साल बीतते गए,आपदा में बुरी तरह घायल होने के बाद वह भटकते-भटकते अलग-अलग जगहों पर पहुंचे। मानसिक स्थिति भी बिगड़ गई थी, इसलिए वह अपना नाम-घर कुछ भी सही से बता नहीं पाता था। भटकते हुए महाराष्ट्र पहुंचे। 2021 में संभाजीनगर के जिस मंदिर में शिवम रुके हुए थे, उसमें चोरी हो गई। गिरफ्तारी के बाद कुछ लुटेरों ने उनका नाम भी इस मामले में घसीट लिया। जब अदालत में शिवम को पेश किया गया, तो जज ने उन्हें ‘डिसआर्गेनाइज्ड सिज़ोफ्रेनिया’ की वजह से पुणे के रीजनल मेंटल हॉस्पिटल (RMH) में भेजने का आदेश दिया।
वहीं, धीरे-धीरे उसकी पहचान की कोशिश शुरू होती है। अस्पताल की एक सामाजिक कार्यकर्ता रोहिणी भोसले इस केस पर काम कर रही थीं। 2023 में एक दिन शिवम ने अचानक रुड़की के अपने स्कूल, ‘प्रेम विद्यालय’ का नाम बताया। यही वह ठोस जानकारी थी जिसकी टीम को तलाश थी। भोसले ने तुरंत हरिद्वार जिले के रुड़की थाने से संपर्क किया और वहां से शिवम के रिश्तेदारों और उनकी पढ़ाई की जानकारी मिल गई।
पुराने रिकॉर्ड निकाले गए और आखिरकार परिवार तक जानकारी पहुँची। तब पता चला कि जिस शिवम को घर ने 12 साल पहले खोया मान लिया था, वह अस्पताल में बिना पहचान के जिंदगी काट रहा था।
परिवार पुणे पहुंचा। दस्तावेजों और मेडिकल प्रक्रिया के बाद उसकी पहचान आधिकारिक रूप से कन्फर्म हुई और अस्पताल ने उसे परिवार को सौंप दिया। बारह साल बाद एक आदमी, जो आपदा में खो गया था, मानसिक अस्पताल से अपने घर वापस लौटा।
कहानी बहुत सरल है। कभी-कभी जिंदगी अपना रास्ता अपने तरीके से बनाती है। कभी बहुत देर लगती है, लेकिन अंत में एक दरवाज़ा खुल ही जाता है।


