
- रिपोर्ट: अनुराग सिंह बिष्ट
यह कोई साधारण चित्र नहीं, यह भारत की आत्मा की पुकार है। यह दृश्य नहीं, बल्कि संवेदना की स्याही में लिखी वह कविता है, जिसमें एक झुकी पीठ और कांपते हाथों के भीतर सदीयों की संस्कृति समाई हुई है।
देश तब रोता है जब उसके सच्चे रक्षक गुमनाम रह जाते हैं। लेकिन वह मुस्कुराता है, जब आखिरकार उन्हें गले लगाकर कहा जाता है — “भारत को तुम पर गर्व है।”
96 वर्षीय भीमाव्वा डोड्डाबलप्पा शिलेक्याथारा — एक ऐसी तपस्विनी जिनकी कठपुतलियों में रामायण और महाभारत पीढ़ियों से जीवित रही। वह न कभी टीवी चैनलों की सुर्ख़ियों में रहीं, न ही बौद्धिक मंचों पर चर्चा का विषय बनीं। फिर भी उन्होंने अपनी साधना से उस सांस्कृतिक विरासत को सहेजा, जो आज के युग में विलुप्तप्राय हो चली है।
अब उन्हें मिला है भारत सरकार द्वारा पद्मश्री — एक ऐसा सम्मान, जो वर्षों से संस्कृति के सच्चे सेवकों का इंतजार करता आया है। जब राष्ट्रपति भवन में उन्हें सम्मानित किया गया, तो वह दृश्य इतिहास की आंख में ठहरी एक अमिट छवि बन गया।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू खुद मंच से उतरकर, झुककर, भागकर उनके पास पहुंचीं — यह सिर्फ औपचारिकता नहीं थी, यह आत्मा की अभिव्यक्ति थी। झुर्रियों से भरे उन हाथों को चूमना, उस झुकी पीठ को सहारा देना, दरअसल भारत की सांस्कृतिक चेतना को सम्मान देना था।
भीमाव्वा अब केवल एक नाम नहीं, वे उस भारत की प्रतीक हैं जहाँ सम्मान सत्ता से नहीं, संवेदना से आता है।



