
- रिपोर्ट: ज्ञानेश वर्मा
दिल्ली देश की राजधानी होने के साथ-साथ आज वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रही है। हर साल सर्दियों के मौसम में दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) खतरनाक स्तर तक पहुँच जाता है, जिससे आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित होता है। प्रदूषण के कारण स्कूल बंद करने, निर्माण कार्य रोकने और यातायात पर नियंत्रण जैसे कदम उठाने पड़ते हैं।
दिल्ली में प्रदूषण के कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण वाहनों से निकलने वाला धुआँ है। बढ़ती आबादी के साथ गाड़ियों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। इसके अलावा औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला धुआँ, निर्माण स्थलों की धूल, कचरा जलाना और आसपास के राज्यों में पराली जलाना भी प्रदूषण को बढ़ाता है। सर्दियों में हवा की गति कम होने और तापमान में गिरावट के कारण प्रदूषक कण हवा में ही जमा हो जाते हैं, जिससे स्मॉग की स्थिति बन जाती है।
प्रदूषण का सीधा असर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। सांस लेने में तकलीफ, आंखों में जलन, खांसी, दमा और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियाँ आम हो गई हैं। बच्चे, बुजुर्ग और पहले से बीमार लोग इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से हृदय रोग और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।
सरकार ने प्रदूषण कम करने के लिए कई कदम उठाए हैं, जैसे ऑड-ईवन योजना, बीएस-6 मानकों को लागू करना, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना और ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP)। इसके बावजूद समस्या पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो पाई है।
इस समस्या से निपटने के लिए सरकार के साथ-साथ आम नागरिकों की भी जिम्मेदारी है। सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, कार-पूलिंग, पेड़ लगाना, कचरा न जलाना और ऊर्जा की बचत जैसे छोटे कदम बड़े बदलाव ला सकते हैं। जब तक सामूहिक प्रयास नहीं होंगे, तब तक दिल्ली को प्रदूषण से मुक्ति पाना मुश्किल रहेगा।





