
- जन जन की आवाज पंकज झा की कलम से
वाराणसी। धार्मिक नगरी काशी स्थित मणिकर्णिका घाट न केवल भारत, बल्कि विश्व के सबसे प्राचीन और निरंतर सक्रिय श्मशान घाटों में शामिल है। गंगा तट पर स्थित यह घाट हिंदू धर्म में मोक्ष प्राप्ति का प्रमुख केंद्र माना जाता है। मान्यता है कि यहां देह त्यागने वाले व्यक्ति को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है।धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान विष्णु के कान की मणि इस स्थान पर गिरने से इसका नाम मणिकर्णिका पड़ा। वहीं दूसरी मान्यता के अनुसार यह स्थल शक्तिपीठ से भी जुड़ा हुआ है, जिससे इसकी धार्मिक महत्ता और बढ़ जाती है।
शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि स्वयं भगवान शिव यहां प्राण त्यागने वाले को तारक मंत्र प्रदान करते हैं। इतिहासकारों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार मणिकर्णिका घाट पर चिता की अग्नि कभी नहीं बुझी। मुगल काल, ब्रिटिश शासन और स्वतंत्र भारत—हर दौर में यह घाट सक्रिय रहा है। प्रतिदिन सैकड़ों शवों का अंतिम संस्कार यहां किया जाता है।
मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार की परंपरा डोम समाज द्वारा निभाई जाती है। यहां चिता की पवित्र अग्नि का अधिकार डोम राजा के पास माना जाता है, जो सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से एक विशिष्ट व्यवस्था है। मोक्ष की कामना लेकर देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेशों से भी लोग अपने परिजनों का अंतिम संस्कार मणिकर्णिका घाट पर कराने आते हैं। यह घाट आस्था, परंपरा और जीवन के अंतिम सत्य का प्रतीक बन चुका है। मणिकर्णिका घाट काशी की उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जहां मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा का पड़ाव माना जाता है। जलती चिताओं के बीच यह घाट जीवन की क्षणभंगुरता और सत्य का बोध कराता है।





