
. रिपोर्ट: ज्ञानेश वर्मा / यूपी हेड
लखनऊ की पहचान केवल उसकी तहज़ीब, संस्कृति और ऐतिहासिक इमारतों से ही नहीं, बल्कि गोमती नदी से भी जुड़ी रही है। यह नदी सदियों से लखनऊ की जीवनरेखा रही है। विशेष रूप से गोमती नगर क्षेत्र को राजधानी का आधुनिक और विकसित हिस्सा माना जाता है। इसी क्षेत्र में गोमती नदी की सफ़ाई, सौंदर्यीकरण और पुनर्जीवन के नाम पर अरबों रुपये खर्च किए गए। बड़े-बड़े दावे किए गए कि गोमती को लंदन की टेम्स नदी की तरह विकसित किया जाएगा, किन्तु आज हकीकत यह है कि गोमती नदी कई स्थानों पर एक नाले जैसी बनकर रह गई है।
गोमती नदी जिसे साफ करने के नाम पर अरबों रुपए खर्च किए गए। आज वह नदी नाला बनकर रह गई है। नालियों का गंदा,जहरीला,झागदार,केमिकल मिला पानी सीधे गोमती में मिल रहा है। जिससे गोमती का पानी दूषित हो रहा है। बड़ा सवाल यह भी उठता है कि सफाई के नाम पर सिंचाई विभाग,नगर निगम विभाग,पर्यावरण विभाग कारवाई के नाम पर सिर्फ खाना पूर्ति करते रहते हैं।
आपको बता दूं की हकीकत में लखनऊ में गोमती नदी का हाल बेहाल हो चुका है। सरकारी योजनाओं के अंतर्गत रिवर फ्रंट परियोजना शुरू की गई। इसके तहत नदी के दोनों किनारों को पक्का किया गया, लाइटिंग लगाई गई, पार्क बनाए गए और पर्यटन को बढ़ावा देने की बातें की गईं। लेकिन इन योजनाओं में नदी की स्वाभाविक धारा, उसकी सफ़ाई और प्रदूषण रोकने पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया।
नतीजा यह हुआ कि ऊपर से देखने में भले ही कुछ हिस्से सुंदर दिखें, पर नदी के अंदर गंदगी, सीवर और औद्योगिक कचरा लगातार गिरता रहा। गोमती नदी में कई नालों का पानी सीधे छोड़ा जाता है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट होने के बावजूद उनका सही संचालन नहीं हो पाया। बरसात के समय नदी में थोड़ा पानी बढ़ जाता है, तो स्थिति कुछ समय के लिए ठीक लगती है, लेकिन गर्मियों में पानी का स्तर घटते ही बदबू, काई और कचरे की सच्चाई सामने आ जाती है। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान हो रहा है, बल्कि आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है।
यह स्थिति केवल प्रशासन की विफलता नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक लापरवाही का भी परिणाम है। लोग खुलेआम कचरा नदी में फेंकते हैं, पूजा सामग्री विसर्जित करते हैं और प्रदूषण फैलाने से नहीं चूकते। विकास के नाम पर कंक्रीट के घाट तो बना दिए गए, लेकिन नदी को जीवित रखने के लिए आवश्यक स्वच्छ जल, जैव विविधता और प्राकृतिक प्रवाह को नजरअंदाज कर दिया गया।
आज आवश्यकता है कि गोमती नदी को केवल सजावटी परियोजना न मानकर एक जीवित प्राकृतिक संसाधन के रूप में देखा जाए। नालों का शोधन अनिवार्य किया जाए, उद्योगों पर सख्ती हो, जनभागीदारी बढ़े और पारदर्शिता के साथ योजनाओं को लागू किया जाए। साथ ही लोगों में जागरूकता फैलाना भी उतना ही जरूरी है।
यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो अरबों रुपये खर्च करने के बावजूद गोमती नदी नाले से आगे नहीं बढ़ पाएगी। गोमती को बचाना केवल सरकार की नहीं, बल्कि हम सभी की जिम्मेदारी है, क्योंकि नदी बचेगी तभी शहर और आने वाली पीढ़ियाँ सुरक्षित रह पाएँगी।





