
- रिपोर्ट: अनुराग सिंह बिष्ट
लखनऊ: लखनऊ विकास प्राधिकरण, का जलवा कुछ और ही है! गांधी जयंती के दिन, जब देश सत्य और अहिंसा की माला जप रहा था, बिल्डर जेई अंगद, ने ऐसी लंका लगा दी कि शर्म भी शरमा जाए। सीलिंग बिल्डिंगों पर निर्माण का तांडव चल रहा है, और तुम्हारे कथित नैतिक अधिकारी तमाशबीन बने ताली पीट रहे हैं।
सीलिंग का मतलब अब रुकावट नहीं, बल्कि डीलिंग का रेट-कार्ड हो गया है! मंण्डलायुक्त ने जनता दरबार में गुस्सा क्या दिखाया, एलडीए के अवर अभियन्त ने उसे स्टैंड-अप कॉमेडी समझ लिया। आदेश? वो तो बस कागज़ी शेर हैं, जो फाइलों में दहाड़ते हैं, लेकिन हकीकत में सीलिंग बिल्डिंगों पर ईंटें जोड़ी जा रही हैं, मानो लखनऊ नहीं, कोई जंगलराज हो। और इस नौटंकी का डायरेक्टर? अंगद सुनते हैं, जोन-6 अमीनाबाद क्षेत्र के गुईन रोड पर स्थित निर्माण को पूर्व अभियंता दीक्षित ने सील किया था। वर्तमान अवर अभियंता अंगद, जिनके राज में बिल्डरों को ऐसी छूट मिली है, जैसे लखनऊ उनकी बपौती हो।
जब दीवारें बोलती हैं, तो वो ईमानदारी की नहीं, जेबों की गर्माहट की कहानी सुनाती हैं। एलडीए के इन महान अधिकारियों की नज़रें तब तक बंद रहती हैं, जब तक नोटों की गड्डी आंखों के सामने न लहराए। तब ये कागज़ी योद्धा ध्वस्तीकरण का ढोल पीटकर वाहवाही लूटेंगे, लेकिन तब तक बिल्डर माल बेचकर मालामाल हो चुका होगा।
ऐसे में सवाल यह है कि लाखों की तनख्वाह लेने वाले ये ज़ोनल अधिकारी व सहायक और अवर अभियन्त आखिर किसके लिए काम कर रहे हैं? मुख्यमंत्री की छवि चमकाने के लिए, या भ्रष्टाचार की गंगा में गोते लगाने के लिए?




