
- रिपोर्ट: ज्ञानेश वर्मा
लखनऊ। हिंदू धर्म, वास्तु शास्त्र और लोक मान्यताओं में घर में कबूतरों के रहने को लेकर अलग-अलग मत हैं। इसे शुभ और अशुभ दोनों ही नजरियों से देखा जाता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार कबूतर को शांति का प्रतीक माना जाता है। कुछ लोग कबूतर को देवी लक्ष्मी का भक्त मानते हैं। ऐसी मान्यता है कि घर में कबूतरों का आना सुख-शांति और समृद्धि लाता है। ऐसा माना जाता है कि कबूतरों को दाना खिलाने से पुण्य मिलता है और घर के सदस्यों पर आने वाले संकट टल जाते हैं।
वास्तु शास्त्र और कुछ व्यावहारिक कारणों से घर में कबूतर का घोंसला बनाना शुभ नहीं माना जाता, यदि कबूतर घर के अंदर घोंसला बना ले, तो इसे आर्थिक प्रगति में रुकावट का संकेत माना जाता है। कहते हैं कि इससे घर में अस्थिरता आती है।
गंदगी और बीमारियां व्यावहारिक नजरिए से देखें तो कबूतरों की बीट (मल) में एसिड होता है जो दीवारों को नुकसान पहुँचाता है। साथ ही, इनकी बीट से सांस संबंधी बीमारियां फैलने का खतरा रहता है, जिसे नकारात्मक ऊर्जा से जोड़कर देखा जाता है। पुरानी धारणा है कि घर में कबूतर का घोंसला होना आने वाले किसी बड़े संकट या आर्थिक तंगी का संकेत हो सकता है।
क्या करना चाहिए?
यदि आपके घर में कबूतर आते हैं, तो यह एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का समय है। कबूतरों को दाना खिलाना बहुत पुण्य का काम है, लेकिन इसे घर की छत या बालकनी के बजाय घर से थोड़ा दूर किसी खुले स्थान या पार्क में खिलाना अच्छा रहेगा। सफाई रखें यदि कबूतरों ने घोंसला बना लिया है, तो सफाई का विशेष ध्यान रखें। वास्तु के अनुसार, घर के भीतर घोंसला होने से बचना चाहिए।
चाहे शुभ हो या अशुभ, कबूतरों को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। यदि घोंसला हटाना भी हो, तो सुनिश्चित करें कि उसमें अंडे या बच्चे न हों।

यह भी जाने की कबूतरों के बीट से कौन से रोग होते..
कबूतरों की बीट (पॉटी) दिखने में भले ही मामूली लगे, लेकिन इसमें कई तरह के बैक्टीरिया, वायरस और फंगस होते हैं जो इंसानों के लिए खतरनाक हो सकते हैं। इसकी सूखी बीट के कण हवा के जरिए हमारे फेफड़ों तक पहुँच जाते हैं।
कबूतर की बीट से होने वाले मुख्य रोग हैं:
हिस्टोप्लाज्मोसिस (Histoplasmosis)
यह एक फंगल इन्फेक्शन है जो कबूतर की बीट में पनपने वाले फंगस के कारण होता है। जब कोई व्यक्ति बीट वाली जगह की सफाई करता है और धूल सांस के जरिए अंदर जाती है, तो यह फेफड़ों को प्रभावित करती है। इसके लक्षण फ्लू जैसे होते हैं।
सिटाकोसिस (Psittacosis)
इसे ‘पैरट फीवर’ भी कहा जाता है। यह क्लैमिडिया सोरकी नाम के बैक्टीरिया से होता है। यह इंसानों में फेफड़ों के संक्रमण (निमोनिया) का कारण बन सकता है, जिससे तेज बुखार, सिरदर्द और खांसी होती है।
क्रिप्टोकोकोसिस (Cryptococcosis)
यह भी एक फंगल संक्रमण है जो कबूतरों के मल में पाया जाता है। यह अक्सर उन लोगों को ज्यादा प्रभावित करता है जिनका इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) कमजोर होता है। गंभीर मामलों में यह फेफड़ों के साथ-साथ मस्तिष्क (मेनिनजाइटिस) को भी प्रभावित कर सकता है।
साल्मोनेलोसिस (Salmonellosis)
यह बैक्टीरिया बीट के जरिए धूल में मिल जाता है और खाने-पीने की चीजों को दूषित कर सकता है। इससे दस्त, पेट दर्द और उल्टी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
अगर आप ऐसी जगह की सफाई कर रहे हैं जहाँ कबूतरों का बसेरा है, तो हमेशा मास्क और दस्ताने पहनें। बीट को सूखा झाड़ने के बजाय उस पर पानी छिड़क कर गीला कर लें, ताकि धूल न उड़े। कबूतरों के संपर्क में आने या सफाई के बाद साबुन से अच्छी तरह हाथ धोएं। अपनी बालकनी या खिड़कियों पर नेट (जाल) लगवाएं ताकि कबूतर वहां बीट न कर सकें।





