- रिपोर्ट: पंकज झा
वाराणसी: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (बीएचयू), वाराणसी के मानविकी अध्ययन विभाग द्वारा “मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान में अभिसरण: पारिस्थितिकी और सतत भविष्य” विषय पर प्रथम वार्षिक सम्मेलन का शुभारंभ 19 मार्च 2026 को देव एवं वर्धना व्याख्यान कक्ष परिसर में किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक दीप प्रज्वलन एवं महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ हुआ, जिसने कार्यक्रम को गरिमामय वातावरण प्रदान किया। इसके पश्चात कुलगीत प्रस्तुति एवं अतिथियों का स्वागत एवं सम्मान किया गया।
सम्मेलन के संयोजक एवं मानविकी अध्ययन विभाग के अध्यक्ष प्रो. पी. के. पांडा ने स्वागत भाषण देते हुए समकालीन पारिस्थितिक एवं सामाजिक चुनौतियों के समाधान हेतु अंतर्विषयी संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। सह-संयोजक प्रो. विनिता चंद्रा ने सम्मेलन की थीम का परिचय देते हुए सतत विकास के विमर्श में मानविकी दृष्टिकोण को समाहित करने की आवश्यकता को रेखांकित किया तथा नीति-निर्माण एवं शैक्षणिक शोध के मध्य सेतु निर्माण पर जोर दिया। मुख्य अतिथि प्रो. अखिलेश सिंह रघुबंशी, निदेशक, पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान, ने अपने संबोधन में सतत भविष्य के निर्माण में शैक्षणिक सहयोग की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने शैक्षणिक पाठ्यक्रमों एवं नीतिगत ढांचों में पारिस्थितिक चेतना को समाहित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. राजेश कुमार, अधिष्ठाता (अनुसंधान एवं विकास), आईआईटी (बीएचयू), ने संस्थान की सतत विकास उन्मुख शोध के प्रति प्रतिबद्धता को दोहराया। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए शोध-आधारित दृष्टिकोण की महत्ता पर प्रकाश डाला कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिसे अनिमेष रॉय, छात्र संयोजक, मानविकी अध्ययन विभाग द्वारा प्रस्तुत किया गया।उद्घाटन सत्र के पश्चात दो प्रभावशाली प्लेनरी व्याख्यान आयोजित किए गए।
आईआईटी खड़गपुर के मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग के प्रो. भागीरथ बेहरा ने मानव व्यवहार एवं सततता के संबंध में विचार व्यक्त करते हुए बताया कि मानव के निर्णय किस प्रकार पारिस्थितिक परिणामों को प्रभावित करते हैं। इसके बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. मृत्युंजय मिश्र ने पारिस्थितिकी एवं अर्थव्यवस्था के परस्पर संबंधों को रेखांकित किया।
दोपहर बाद सम्मेलन के अंतर्गत समानांतर शैक्षणिक सत्र आयोजित किए गए, जिनमें पवित्र पारिस्थितिकी, आदिवासी ज्ञान परंपराएं, पारिस्थितिक सौंदर्यशास्त्र तथा सततता के तकनीकी आयामों जैसे विविध विषयों पर चर्चा हुई। देशभर से आए शोधकर्ताओं ने पवित्र उपवनों, जनजातीय उत्सवों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के पारिस्थितिक प्रभावों तथा साहित्य में पर्यावरणीय संकट के चित्रण जैसे विषयों पर अपने शोध प्रस्तुत किए।
दिन के दूसरे सत्र में दैनिक जीवन में पारिस्थितिक व्यवहार, एंथ्रोपोसीन की मीडिया में प्रस्तुति, स्वदेशी पारिस्थितिक ज्ञान, पर्यावरणीय चेतना एवं पर्यावरणीय न्याय जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। इसमें डिजिटल संस्कृति में खाद्य अपशिष्ट, मीडिया में पारिस्थितिक आघात, जनजातीय मिथक, लोक परंपराएं तथा विस्थापन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की गई।
इन सत्रों में देशभर से आए विद्वानों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की उत्साहपूर्ण सहभागिता रही तथा विचारों का सार्थक आदान-प्रदान हुआ। सम्मेलन का प्रथम दिवस सफलतापूर्वक संपन्न हुआ और आगामी सत्रों के लिए एक मजबूत आधार स्थापित किया।




