
- रिपोर्ट:ज्ञानेश वर्मा
लखनऊ।भारत समेत पूरी दुनिया में बढ़ती जनसंख्या एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। हाल के वर्षों में जनसंख्या की रफ्तार, उसकी संरचना और उससे जुड़ी चुनौतियां नीति-निर्माताओं के लिए गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही हैं। जहां कुछ देशों में आबादी तेजी से बढ़ रही है, वहीं कई विकसित देशों में जनसंख्या में गिरावट और बुजुर्गों की बढ़ती संख्या एक नई समस्या के रूप में सामने आ रही है।
भारत की बात करें तो यहां की युवा आबादी को देश की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। कार्यशील आयु वर्ग की बड़ी जनसंख्या अर्थव्यवस्था को गति देने में अहम भूमिका निभा सकती है। लेकिन इसके साथ ही रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और बुनियादी सुविधाओं पर दबाव भी लगातार बढ़ रहा है। गांवों से शहरों की ओर बढ़ता पलायन शहरी जनसंख्या में तेजी से इजाफा कर रहा है, जिससे ट्रैफिक जाम, वायु प्रदूषण, जल संकट और अव्यवस्थित शहरीकरण जैसी समस्याएं गंभीर रूप लेती जा रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जनसंख्या केवल संख्या का विषय नहीं है, बल्कि उसकी गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, तो बड़ी आबादी विकास का आधार बनने के बजाय बोझ बन सकती है। इसी कारण सरकारें परिवार नियोजन, महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और जन-जागरूकता पर विशेष जोर दे रही हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी जागरूकता की कमी और सीमित संसाधनों के चलते जनसंख्या वृद्धि की दर अपेक्षाकृत अधिक बनी हुई है। वहीं शहरी इलाकों में बढ़ती महंगाई, करियर की प्राथमिकताएं और जीवनशैली में बदलाव के कारण परिवार छोटे होते जा रहे हैं। यह असंतुलन भविष्य में सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।
वैश्विक स्तर पर भी बढ़ती जनसंख्या का सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा और प्राकृतिक संसाधनों की कमी से जुड़ा हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि बिना संयुक्त प्रयासों और दीर्घकालिक नीतियों के इन चुनौतियों से निपटना आसान नहीं होगा।
कुल मिलाकर, जनसंख्या आज अवसर भी है और चुनौती भी। यदि सही नीतियां बनाई जाएं, जन-जागरूकता बढ़ाई जाए और शिक्षा व कौशल विकास में निवेश किया जाए, तो बढ़ती जनसंख्या को देश और दुनिया के विकास का मजबूत आधार बनाया जा सकता है।





