
नई दिल्ली: अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के पूर्व अधिकारी जॉन किरियाको ने हाल ही में एक साक्षात्कार में भारत-पाकिस्तान संबंधों, आतंकवाद विरोधी अभियानों, और अमेरिका-पाकिस्तान की नीतियों पर कई अहम खुलासे किए। उन्होंने बताया कि 9/11 हमलों के बाद पाकिस्तान में चल रहे अभियानों के दौरान उन्हें इस्लामाबाद और वाशिंगटन के बीच के जटिल और अविश्वासी रिश्तों को करीब से समझने का मौका मिला।
किरियाको ने खुलासा किया कि 2002 के ऑपरेशन पराक्रम के समय उन्हें पूरा यकीन था कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ने वाला है। उन्होंने बताया कि उस वक्त हालात इतने गंभीर थे कि उन्होंने अपने परिवार को इस्लामाबाद से सुरक्षित बाहर भेज दिया था। उनके अनुसार, दिसंबर 2001 में भारतीय संसद पर हुए आतंकी हमले के बाद दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया था और स्थिति को संभालने के लिए अमेरिका को हस्तक्षेप करना पड़ा। अमेरिकी उप-विदेश सचिव ने तब नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच लगातार बातचीत कर समझौते का रास्ता निकाला, जिससे युद्ध टल गया।
पूर्व सीआईए अधिकारी ने स्वीकार किया कि उस दौर में अमेरिका का पूरा ध्यान अल-कायदा और अफगानिस्तान पर केंद्रित था, इसलिए भारत के मुद्दों को उतनी गंभीरता से नहीं लिया गया। उन्होंने कहा कि 2008 के मुंबई हमलों के समय उन्हें शुरू से ही यह अंदेशा था कि यह अल-कायदा नहीं, बल्कि पाकिस्तान समर्थित कश्मीरी आतंकी संगठनों की साजिश थी — और बाद में यही सच साबित हुआ।
किरियाको ने कहा कि पाकिस्तान लगातार भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देता रहा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने कभी सख्त कदम नहीं उठाए। उन्होंने भारत की प्रतिक्रिया की सराहना करते हुए कहा कि संसद हमले और मुंबई हमलों के बाद भारत ने “रणनीतिक धैर्य” का परिचय दिया। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि अब भारत ऐसी स्थिति में पहुंच चुका है, जहां यह धैर्य कमजोरी समझे जाने का जोखिम नहीं उठा सकता।
किरियाको ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के भीतर मौजूद आंतरिक विभाजन का भी खुलासा किया। उनके अनुसार, वास्तव में दो आईएसआई काम कर रही थीं — एक जो अंतरराष्ट्रीय सहयोग के तहत काम करती थी और दूसरी, जो कट्टरपंथी तत्वों से प्रभावित होकर जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों को समर्थन दे रही थी।
उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि 2002 में लाहौर में लश्कर-ए-तैयबा के एक ठिकाने पर की गई कार्रवाई के दौरान तीन आतंकियों की गिरफ्तारी हुई थी। उनके पास से अल-कायदा के प्रशिक्षण दस्तावेज मिले, जिससे पहली बार पाकिस्तान सरकार और अल-कायदा के बीच संबंधों के ठोस सबूत सामने आए।
जब उनसे पूछा गया कि अमेरिका ने पाकिस्तान के खिलाफ कोई सख्त कदम क्यों नहीं उठाया, तो किरियाको ने कहा कि यह व्हाइट हाउस का राजनीतिक निर्णय था। उस समय अमेरिका को पाकिस्तान की जरूरत थी — और यह रिश्ता केवल दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं था, बल्कि वैश्विक रणनीतिक समीकरण का हिस्सा था।




