
- रिपोर्ट: पंकज झा
वाराणसी। कमिश्नरेट वाराणसी में गुंडा एक्ट के एक महत्वपूर्ण प्रकरण में आरोपी को बड़ी राहत मिली है। अपर पुलिस आयुक्त, कमिश्नरेट वाराणसी द्वारा पारित आदेश में धारा 3(1) उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970 के अंतर्गत जारी नोटिस को निरस्त करते हुए आरोपी के विरुद्ध प्रस्तावित कार्यवाही समाप्त कर दी गई। वाद संख्या 150/2025, सरकार बनाम रवि सोनकर, थाना कैंट, कमिश्नरेट वाराणसी में दिनांक 15 अक्टूबर 2025 को पारित आदेश में यह उल्लेख किया गया कि आरोपी के विरुद्ध दो आपराधिक मामलों के आधार पर गुंडा एक्ट की कार्यवाही प्रारंभ की गई थी।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने यह प्रभावी तर्क प्रस्तुत किया कि केवल दो मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति को गुंडा अधिनियम की परिभाषा में नहीं रखा जा सकता।आदेश में यह भी उल्लेखित है कि माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा Govardhan Vs. State of U.P. (क्रिमिनल मिस. रिट पिटिशन संख्या 12619/2023) में प्रतिपादित विधि सिद्धांत के अनुसार, मात्र दो प्रकरणों के आधार पर किसी व्यक्ति को गुंडा घोषित करना न्यायसंगत नहीं है। तथ्यों एवं परिस्थितियों के परीक्षण के उपरांत यह पाया गया कि धारा 3(1) के अंतर्गत की गई कार्यवाही विधि सम्मत नहीं है, फलस्वरूप नोटिस निरस्त कर दिया गया।अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी आशुतोष शुक्ला व राजेश त्रिवेदी ने संयुक्त रूप से कहा—
“गुंडा नियंत्रण अधिनियम के अंतर्गत की जाने वाली कार्यवाही अत्यंत कठोर प्रकृति की होती है, जो किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक प्रतिष्ठा एवं संवैधानिक अधिकारों को सीधे प्रभावित करती है। ऐसी स्थिति में कानून का प्रयोग यांत्रिक अथवा औपचारिक आधार पर नहीं किया जा सकता।‘सतत आपराधिक प्रवृत्ति’ तथा ‘लोक शांति के लिए वास्तविक एवं तात्कालिक खतरे’ का ठोस एवं स्वतंत्र आधार अनिवार्य है। केवल दो मामलों के आधार पर किसी नागरिक को गुंडा की श्रेणी में रखना विधि के मूल सिद्धांतों के प्रतिकूल है।हमारा यह मानना है कि प्रत्येक प्रकरण में तथ्यों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन तथा न्यायसंगत संतुष्टि आवश्यक है। यह आदेश विधि के शासन, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक सुरक्षा की पुनः पुष्टि करता है।”
अपर पुलिस आयुक्त द्वारा पारित आदेश में पूर्व में जारी नोटिस को निरस्त करते हुए थाना प्रभारी कैंट को आवश्यक अनुपालन हेतु निर्देशित किया गया है।कानूनी हलकों में इस निर्णय को एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें प्रभावी एवं तथ्याधारित पैरवी के माध्यम से आरोपी को न्यायोचित राहत प्राप्त हुई।





