
- रिपोर्ट: अनुपम श्रीवास्तव |
गोरखपुर: 2 अक्टूबर, यह दिन देश को दो महान विभूतियों की याद दिलाता है—महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री। शास्त्री जी का जीवन भारतीय राजनीति के लिए वह आईना है, जिसमें त्याग, सादगी और कर्तव्यनिष्ठा की झलक साफ दिखाई देती है।
1904 में उत्तर प्रदेश के मुगलसराय की धरती पर जन्मे शास्त्री जी ने बाल्यावस्था में ही पिता को खो दिया। कठिनाइयों से भरा बचपन और सीमित संसाधनों में पली शिक्षा ने उन्हें संघर्ष की गहराइयों से रूबरू कराया। लेकिन इन्हीं संघर्षों ने उनकी अंतरात्मा को मजबूत किया और उन्हें जनता के सच्चे सेवक के रूप में गढ़ा।
स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में शास्त्री जी ने युवावस्था से ही जेल यात्राएं कीं। गांधी जी के सिद्धांत उनके जीवन की दिशा बन गई। आजादी के बाद उन्होंने राजनीति में कई अहम पदों की जिम्मेदारी निभाई, लेकिन सत्ता उनके लिए कभी आकर्षण का साधन नहीं बनी। रेल मंत्री रहते हुए एक रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उनका इस्तीफा भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में स्वच्छ राजनीति का अनुपम उदाहरण है।
प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने देश को “जय जवान, जय किसान” का नारा दिया। यह केवल शब्द नहीं थे, बल्कि देश की आत्मा को झकझोर देने वाला आह्वान था। एक ओर सीमा पर डटे जवान, दूसरी ओर खेतों में मेहनत करते किसान—दोनों ही भारत की रीढ़ हैं। शास्त्री जी का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उस दौर में था।
आज जब राजनीति में सत्ता, दिखावा और व्यक्तिगत स्वार्थ हावी होते दिख रहे हैं, तब शास्त्री जी की सादगी और ईमानदारी एक आदर्श की तरह सामने आती है। उनकी जीवनशैली हमें यह सिखाती है कि बड़ा बनने के लिए ऊँचे पद की नहीं, बल्कि ऊँचे विचारों की आवश्यकता होती है।
लाल बहादुर शास्त्री भले ही कद में छोटे थे, लेकिन उनके आदर्श और नैतिकता का कद इतना विशाल था कि आज भी उनकी छवि भारतीय लोकतंत्र के आसमान में ध्रुवतारा की तरह चमक रही है।
मैं पुनः पूर्व प्रधानमंत्री, ‘भारत रत्न’ लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती पर उन्हें कोटिश: नमन करता हूं।



