
गोरखपुर 25 दिसम्बर: एक ऐसा दिन जो दुनिया के एक हिस्से में उल्लास और रोशनी का पर्व है,
तो भारत के लोकतंत्र में यह दिन विचार, विवेक और व्यवस्था का प्रतीक बन चुका है।
यही दिन है सुशासन दिवस का —
और यही दिन है उस नेता की जयंती का, जिसने सत्ता को शोर नहीं,
शालीनता दी —
नाम था अटल बिहारी वाजपेयी।
सुशासन दिवस क्यों?
भारत सरकार ने वर्ष 2014 में यह निर्णय लिया कि
25 दिसम्बर, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती को
“सुशासन दिवस” के रूप में मनाया जाएगा।
कारण साफ था —
क्योंकि अटल जी का पूरा राजनीतिक जीवन
सुशासन का जीवंत उदाहरण था।
सुशासन का अर्थ सिर्फ सरकार चलाना नहीं,
बल्कि ऐसा शासन —
जहाँ
सत्ता जवाबदेह हो
प्रशासन पारदर्शी हो
और जनता खुद को शासन का हिस्सा महसूस करे
अटल बिहारी वाजपेयी इसी सोच के प्रतिनिधि थे।
पूर्व प्रधानमंत्री से क्या है संबंध?
25 दिसम्बर 1924 को जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी
भारत के ऐसे प्रधानमंत्री रहे जिन्होंने
विरोधियों को भी सम्मान दिया
और सत्ता को संवाद की भाषा सिखाई।
उनके शासनकाल में —
निर्णय तेज थे, लेकिन संयमित
नीति स्पष्ट थी, लेकिन मानवीय
और नेतृत्व कठोर नहीं, संवेदनशील था
यही वजह है कि उनके नाम के साथ
“सुशासन” शब्द अपने आप जुड़ जाता है।
अटल जी मानते थे —
“सरकार का असली धर्म जनता की सेवा है, न कि सत्ता का प्रदर्शन।”
आज के समय में सुशासन का अर्थ
आज जब व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं,
जब फाइलें दौड़ती हैं और पीड़ित भटकता है,
तब सुशासन दिवस
सिर्फ एक तारीख नहीं,
बल्कि आत्ममंथन का अवसर बन जाता है।
यह दिन याद दिलाता है कि —
कानून का राज होना चाहिए
आख़िरी पंक्ति का व्यक्ति भी सुना जाए
और शासन का चेहरा डर नहीं, भरोसा बने
अनुपम की पाती.. का सवाल
सवाल सिर्फ इतना है —
क्या हमने सुशासन को
कार्यक्रम तक सीमित कर दिया है,
या फिर उसे व्यवहार में उतारा है?
क्या जनता को आज भी दफ्तरों में
दर-दर भटकना पड़ता है?
क्या शिकायत सुनने के लिए
अब भी “पहचान” ज़रूरी है?
अगर हाँ —
तो सुशासन दिवस
सिर्फ श्रद्धांजलि बनकर रह जाएगा।
अंत में…
25 दिसम्बर
हमें याद दिलाता है कि
अटल बिहारी वाजपेयी कोई विचारधारा नहीं,
एक राजनीतिक संस्कार थे।
सुशासन दिवस
उनकी जयंती का औपचारिक आयोजन नहीं,
बल्कि एक चेतावनी है —
कि अगर शासन जनविरोधी हुआ,
तो लोकतंत्र खोखला हो जाएगा।





