
सीकर/वृंदावन: संतों का तेज उनके भव्य वस्त्रों या पदों में नहीं, बल्कि उनकी विनम्रता और आंतरिक श्रद्धा में निहित होता है। इसका जीवंत उदाहरण हाल ही में वृंदावन में देखने को मिला, जब रैवासा पीठाधीश्वर राजेंद्र दास जी महाराज ने प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज से भेंट की। यह आध्यात्मिक मिलन इतना भावुक था कि इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और लाखों लोगों के हृदय को छू गया।
🔸 केलीकुंज में हुआ भावनात्मक मिलन
यह आत्मिक भेंट श्रीराधाहित केलीकुंज, वृंदावन में हुई। जैसे ही प्रेमानंद महाराज ने राजेंद्र दास जी को आते देखा, वे स्वास्थ्य ठीक न होने के बावजूद उन्हें सम्मान देने स्वयं द्वार तक पहुंचे। उन्होंने करुणा और नम्रता से भरे भाव में दंडवत प्रणाम किया। यह देख राजेंद्र दास जी भी भावुक हो उठे और उन्होंने भी प्रेमानंद जी को उसी भाव से प्रणाम किया।
🔸 भावनाओं से सराबोर हुआ माहौल
इसके पश्चात प्रेमानंद महाराज ने राजेंद्र दास जी को अपने आसन पर बैठाया, उनके चरण धोए और भावपूर्ण गुरुवंदना की। वहां उपस्थित भक्तगण इस दृश्य को देखकर आनंद और श्रद्धा से विभोर हो उठे।
🔸 विनम्रता की मिसाल
सत्संग के दौरान प्रेमानंद महाराज ने अग्रदेवाचार्य और गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित विनय पत्रिका के पद सुनाए। उन्होंने खुद नीचे जमीन पर बैठकर हाथ जोड़ लिए और विनय भाव से सत्संग में सम्मिलित हुए। उनकी आंखों से बहते विनम्रता के आंसू और राजेंद्र दास जी की करुणामयी मुस्कान ने वातावरण को पूर्णतः भक्तिमय बना दिया।
🔸 संतवाणी और भजन की प्रस्तुति
भेंट के अंत में प्रेमानंद महाराज के आग्रह पर राजेंद्र दास जी ने विनय पत्रिका की चौपाई—
“प्रिय राम नाम तें जाहि न रामों”
और रैवासा पीठ के संस्थापक का भजन—
“प्यारी तेरे नैना”
गाकर सुनाया, जिससे वहां उपस्थित सभी श्रोता आत्मविभोर हो गए।
🔸 सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो
यह संपूर्ण वीडियो प्रेमानंद महाराज के आधिकारिक यूट्यूब चैनल ‘भजन मार्ग’ पर साझा किया गया है। एक दिन में ही इसे 10 लाख से अधिक बार देखा गया, और अब तक यह संख्या 14 लाख पार कर चुकी है।
इंस्टाग्राम पर भी इस संत मिलन की रील्स और क्लिप्स जमकर वायरल हो रही हैं। लोग कमेंट्स में संतों की नम्रता, प्रेम और सच्ची भक्ति की सराहना करते नहीं थक रहे।
निष्कर्ष:
वृंदावन की यह घटना दर्शाती है कि सच्चे संतों की पहचान गर्व नहीं, विनम्रता में होती है। यह मिलन सिर्फ दो संतों का नहीं था, बल्कि सच्चे आध्यात्मिक मूल्यों का उत्सव था, जिसने भक्ति, प्रेम और नम्रता की नई मिसाल पेश की है।




