
उत्तर प्रदेश राज्य सचिवालय में अतिरिक्त निजी सचिव अमर सिंह की बर्खास्तगी के आदेश को हाई कोर्ट ने निरस्त कर उन्हें पुनः नियुक्ति का आदेश दिया है। यह बर्खास्तगी वर्ष 2020 में एक व्हाट्सएप संदेश को कथित तौर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री के रूप में अग्रेषित करने के मामले में हुई थी।
कोर्ट का निर्णय
न्यायमूर्ति आलोक माथुर ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता ने अनजाने में संदेश को फॉरवर्ड किया था और यह साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे कि उन्होंने जानबूझकर सरकार की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की मंशा से ऐसा किया। न्यायमूर्ति ने यह भी कहा कि इस मामले में सजा अनुचित और अनुपातहीन थी। उन्होंने सुझाव दिया कि अधिकतम सजा याचिकाकर्ता के सेवा रिकॉर्ड में प्रतिकूल प्रविष्टि या आधिकारिक निंदा होनी चाहिए थी।
मामले का विवरण
याचिकाकर्ता अमर सिंह उस समय राज्य सचिवालय में अतिरिक्त निजी सचिव के पद पर कार्यरत थे और एक व्हाट्सएप ग्रुप के एडमिन थे। इसी ग्रुप पर एक संदेश फॉरवर्ड किया गया, जिसे सरकार ने आपत्तिजनक माना। अमर सिंह ने तुरंत संदेश को डिलीट करने और ग्रुप के सदस्यों से भी इसे हटाने का अनुरोध किया। उन्होंने अपनी मर्जी से मुख्य सचिव को इस घटना के लिए माफी मांगते हुए पत्र भी लिखा।
अनुशासनात्मक कार्रवाई
इस घटना के बाद अमर सिंह के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच शुरू की गई, और उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। हालांकि हाई कोर्ट ने पाया कि अमर सिंह के कार्य दुर्भावनापूर्ण नहीं थे और उन्होंने पूरी निष्ठा के साथ गलती को सुधारने का प्रयास किया।
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हाई कोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ कि सरकारी कर्मचारियों को अनुशासन बनाए रखने के साथ-साथ उनकी ईमानदारी और मंशा का भी सम्मान किया जाना चाहिए। न्यायालय ने इस आदेश से न केवल अमर सिंह को न्याय दिया है, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं में संतुलन बनाए रखने का भी संदेश दिया है।





